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Showing posts from May, 2018

तेरी याद आ रही है

अब साँस साँस में इक महशर उठा रही है तेरी बात बात मुझ को अब याद आ रही है
वो पहली पहली नज़रें उल्फ़त का पहला मौसम बेताब सी तमन्ना, वो रहबरी का आलम मुझे देख कर तेरा वो कोई शेर गुनगुनाना कोई दास्तान कहना कोई मसअला सुनाना रंगों की चाशनी में भीगे पयाम सारे वो गीत, वो तराने, वो झूमते इशारे ख़्वाबों की बारिशों में वो भीगती सी बातें वो लाज़वाल जज़्बा, वो बेतकान रातें वो आशिक़ी का जादू इक़रार का वो नश्शा वो डूबती सी धड़कन इसरार का वो नश्शा जब रक़्स में थे लम्हे, आलम ख़ुमार में था इक बेक़रार नग़्मा हर इक क़रार में था
उल्फ़त का आशिक़ी का हर इक रिवाज बदला मौसम की तरह जानाँ तेरा मिज़ाज बदला जज़्बों की वो दीवाली अरमान की वो ईदें रूठे वो ख़्वाब सारे टूटीं सभी उम्मीदें
जादू वो आशिक़ी का गो अब भी जागता है नश्शा वो दर्द बन कर सीने में चुभ रहा है रोती है हर तमन्ना, ज़ख़्मी है हर नज़ारा बैठा है मुँह छुपाए हर झूमता इशारा हर दास्तान चुप है ख़ामोश हैं फ़साने अब खून रो रहे हैं वो गीत वो तराने
मिज़गाँ की चिलमनों में मोती पिरो गया है जाने कहाँ वो तेरा अब प्यार खो गया है अब साँस साँस में इक महशर उठा रही है तेरी बात बात मुझ को अब याद आ रही …

मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा

मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा सर्द सा इक रंग फैला जा ब जा रह जाएगा
कर तो लूँ तर्क-ए-मोहब्बत लेकिन उस के बाद भी कुछ अधूरी ख़्वाहिशों का सिलसिला रह जाएगा
कारवाँ तो खो भी जाएगा ग़ुबार-ए-राह में दूर तक फैला हुआ इक रास्ता रह जाएगा
टूट जाएँगी उम्मीदें, पस्त होंगे हौसले एक तन्हा आदमी बे दस्त-ओ-पा रह जाएगा
मैं अगर अपनी ख़मोशी को अता कर दूँ ज़ुबाँ हैरतों के दायरों में तू घिरा रह जाएगा
रुत भी बदलेगी, बहारें आ भी जाएँगी मगर इस ख़िज़ाँ का राज़ चेहरे पर लिखा रह जाएगा
हाफ़िज़े से नक़्श यूँ ही मिटते जाएँगे अगर दूर तक आँखों में इक दश्त-ए-बला रह जाएगा
अपना सब कुछ खो के पाया है तुझे “मुमताज़” ने खो गया तू भी तो मेरे पास क्या रह जाएगा

चलन ज़माने के ऐ यार इख़्तियार न कर

चलन ज़माने के ऐ यार इख़्तियार न कर ख़ुशी के साथ मेरी वहशतें शुमार न कर
तेरी हयात का गुज़रा वो एक लम्हा है वो अब न आएगा, अब उसका इंतज़ार न कर
तिजारतों में दिलों की सुना नहीं करते दिलों की बात पे इतना भी ऐतबार न कर
बहुत हैं क़ीमती गौहर इन्हें संभाल के रख ज़रा सी बात पे आँखों को अश्कबार न कर
मिलेगी कोई न क़ीमत मचलते जज़्बों की तू अपनी रूह के ज़ख़्मों का कारोबार न कर
सिवा शदीद निदामत के क्या मिलेगा तुझे सवाल कर के तअल्लुक़ को शर्मसार न कर
है इब्तेदा ही अभी मुश्किलों की, हार न मान अभी ग़मों को तबीयत पे आशकार न कर
अब इतना भी तो न महदूद कर वजूद अपना ज़ुबाँ के तीर से जज़्बात का शिकार न कर
दिलों की ख़ाम ख़याली का क्या यक़ीं मुमताज़ तू दिल की बात पे इतना भी ऐतबार न कर
शुमार गिनती, हयात ज़िन्दगी, तिजारतों में व्यापार में, अश्कबार आंसुओं से भरी हुई, निदामत शर्मिंदगी, आशकार ज़ाहिर, हिसार-ए-ज़ात व्यक्तित्व का घेरा, महदूद सीमित

मेरी ख़ुशबू अगर सबा ले जाए

मेरी ख़ुशबू अगर सबा ले जाए संग यादों का क़ाफ़िला ले जाए
मेरे हाथों से लिक्खा नाम अपना क्यूँ किताबों में वो दबा ले जाए
और मेरे पास क्या है इस के सिवा वो जो चाहे, मेरी वफ़ा ले जाए
बेरहम है जहान-ए-ज़र का निज़ाम सर से ग़ुर्बत के जो रिदा ले जाए
अब तो यादें भी मेरे पास नहीं वो जो ले जाए भी तो क्या ले जाए
क्या बुरा है कि अपनी आँखों में ख़्वाब मेरे भी वो बसा ले जाए
मेरी वहशत सँभाल कर अक्सर ज़िंदगी से मुझे बचा ले जाए
कह दो “मुमताज़” क़ुर्ब का अपने लम्हा लम्हा वो अब उठा ले जाए

हमारे बीच पहले एक याराना भी होता था

हमारे बीच पहले एक याराना भी होता था कभी चेहरा तुम्हारा मेरा पहचाना भी होता था
यही काफ़ी कहाँ था, तेरे आगे सर झुका देते हमें दुनिया के लोगों को जो समझाना भी होता था
शिकम की आग में जलना तो फिर आसान था यारब मगर दो भूके बच्चों को जो बहलाना भी होता था
फ़सीलें उन हवादिस ने दिलों में खेंच डाली थीं “हर इक आबाद घर में एक वीराना भी होता था”
गुज़र कर बारहा तूफ़ान-ए-यास-ओ-बदनसीबी से फ़रेब-ए-ज़िन्दगी दानिस्ता फिर खाना भी होता था
धरम और ज़ात के हर ऐब से जो पाक था यारो रह-ए-दैर-ओ-हरम में एक मयख़ाना भी होता था
तुम्हें अब याद हो “मुमताज़” की चाहे न हो लेकिन कभी दुनिया के लब पर अपना अफ़साना भी होता था

नज़्म – जीत

जो हौसला बलंद है नफ़स नफ़स कमंद है हमारी हर ख़ुशी हमारे हौसलों में बंद है वो बेकसी अतीत है यही हमारी जीत है हर एक देशवासी के लबों पे ये ही गीत है
ये एकता मिसाल है हमारा ये कमाल है वतन के लब पे आज भी मगर वही सवाल है
है कौन दूध का धुला अभी तलक नहीं खुला अभी तक इस पियाले में जहर का घूंट है घुला भरें सभी तिजोरियाँ हैं कैसी कैसी चोरियाँ सुला रहे हैं हम ज़मीर को सुना के लोरियाँ
उठो, कि वक़्त आ गया बढ़ाओ हर कदम नया ज़रा तो तुम भी सोच लो कि फ़र्ज़ है तुम्हारा क्या ज़रा तो ख़ुद में झांक लो ज़मीर को भी आंक लो फ़रीज़े की जबीन पर कोई सितारा टाँक लो ये छोटी छोटी चोरियाँ जो जुर्म की हैं बोरियाँ हमारे मुल्क के लिए बनी हैं जो निंबोरियाँ इन्हें भी अब मिटाएँगे ख़ुदी को आज़माएँगे कि हाथ यूँ बढ़ाएँगे ज़मीर को जगाएँगे खिलाना है नया चमन बनाना है नया वतन बदल दें आओ मिल के हम समाज के सभी चलन न भेद ज़ात पाँत का न धर्म का न ज़ात का जवाब हम को देना है सदी सदी की बात का
यही हमारी जीत है यही तो भारी जीत है बुराइयों की हार में

नज़्म – दूसरा गाँधी

समंदर से उठी, देहली तलक फिर छा गई आँधी जो आमादा हुआ अनशन पे अगली क़ौम का गाँधी हुकूमत से कहा ललकार कर, अब सामने आओ मिटा डालो करप्शन या तो कुर्सी से उतर जाओ
जो सदियों सदियों से कुचले हुए लूटे हुए थे हम जो मज़हब ज़ात के टुकड़ों में बस टूटे हुए थे हम हमारे मुंतशिर थे दिल न जाने कितने ख़ानों में धरम में, ज़ात में, क़ौमों में, रक़्बों में, ज़बानों में हमारी हर नफ़स बेजान थी, जज़्बात मुर्दा थे हर इक हसरत हेरासाँ थी, सभी जज़्बात मुर्दा थे
वो बहर-ए-बेकराँ हसरत का फिर अंगड़ाई ले उठ्ठा नया जज़्बा, नई ताक़त, नई बीनाई ले उठ्ठा वो बेकस, बेबस-ओ-मजबूर एहसासात जाग उठ्ठे मिटा डाला था जिन को वक़्त ने, जज़्बात जाग उठ्ठे
पुकार इस देश की धरती की हम को इक जगह लाई हज़ारे ने ज़रा आवाज़ दी, दुनिया सिमट आई कमर कस कर उठा हर देशवासी अपनी ताक़त भर झुका सकता नहीं कोई हमें अब अपने क़दमों पर
हमारे सब्र का अब इम्तेहाँ कोई नहीं लेगा हिसाब अब पाई पाई का सभी से बिल यक़ीं लेगा हमारे देश के दिल की सदा अन्ना हज़ारे है नई इस क़ौम का अब रहनुमा अन्ना हज़ारे है

करवट करवट जलता होगा

करवट करवट जलता होगा वो भी क्या सो पाया होगा
मेरे बिना अब तन्हा होगा वो भी शायद रोया होगा
रात गए जब तन्हा होगा याद तो मुझ को करता होगा
उलझन में मेरे बारे में जाने क्या क्या सोचा होगा
शाम को सूरज डूबेगा तो उस का दिल भी डूबा होगा
उम्र तो कट जाएगी लेकिन लम्हा लम्हा प्यासा होगा
अब भी मैं सोचा करती हूँ जाने अब वो कैसा होगा
हम ख़ुद ही “मुमताज़” मिटे हैं किस्मत से क्यूँ शिकवा होगा

नज़्म - न जाने कौन है

न जाने कौन है वो अजनबी वो हमनवा मेरा
न जाने कब से इक एहसास बन कर आ गया है वो खयाल-ओ-ख़्वाब पर, जह्न-ओ-तबअ पर छा गया है वो कभी सरगोशियों में धड़कनों की लय सुनाता है कभी चुपके से इक उल्फ़त का नग़्मा गुनगुनाता है
ख़ुमारी झाँकती रहती है बहकी बहकी साँसों से कभी साँसें महक उठती हैं उसकी महकी साँसों से कभी उसके लबों का लम्स छू लेता है गालों को चुना करती हैं आँखें उसकी नज़रों के उजालों को
न जाने कौन है, किस की इबादत करती रहती हूँ किसी एहसास के पैकर से उल्फ़त करती रहती हूँ मेरे जज़्बे की धड़कन है, मेरी उल्फ़त का दिल है वो तसव्वर है, तख़य्युल है, सराब-ए-मुस्तक़िल है वो
न जाने कौन है वो अजनबी वो हमनवा मेरा

मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा

मुझ में क्या तेरे तसव्वर के सिवा रह जाएगा सर्द सा इक रंग फैला जा ब जा रह जाएगा
कर तो लूँ तर्क-ए-मोहब्बत लेकिन उस के बाद भी कुछ अधूरी ख़्वाहिशों का सिलसिला रह जाएगा
कारवाँ तो खो भी जाएगा ग़ुबार-ए-राह में दूर तक फैला हुआ इक रास्ता रह जाएगा
टूट जाएँगी उम्मीदें, पस्त होंगे हौसले एक तन्हा आदमी बे दस्त-ओ-पा रह जाएगा
मैं अगर अपनी ख़मोशी को अता कर दूँ ज़ुबाँ हैरतों के दायरों में तू घिरा रह जाएगा
अपना सब कुछ खो के पाया है तुझे “मुमताज़” ने खो गया तू भी तो मेरे पास क्या रह जाएगा

नज़्म पार्ट 2 - यास

मैं तेरी मुन्तज़िर ता उम्र जानां रह भी सकती थी हर इक रंज ओ अलम हर इक मुसीबत सह भी सकती थी तेरे बस इक इशारे पर मुझे मरना गवारा था तेरा बस इक इशारा, जो मेरे दिल का सहारा था
रिहाई हो चुकी, लेकिन अभी ज़ंजीर बाक़ी है शिकस्ता हो चुका सपना, मगर ताबीर बाक़ी है तसव्वुर की ज़मीं पर अब नई फ़स्लें उगाना है अभी है जुस्तजू अपनी, अभी तो ख़ुद को पाना है
धड़कती ज़िन्दगी की लय अभी ख़ामोश करती हूँ अभी तस्वीर ए हस्ती में नए कुछ रंग भरती हूँ ये बिखरी किरचें दिल की तो उठा लूं, फिर ज़रा दम लूं ज़रा ज़ख्मों को ख़ुश सूरत बना लूं, फिर ज़रा दम लूं ज़रा इन शबनमी यादों के क़तरों को सुखा डालूँ ज़िबह कर लूं ज़रा उम्मीद को, हसरत को दफ़ना लूं
उम्मीदों के सरों से अब नई लडियां बनाउँगी मैं अपने ज़हन के खद्शात को अब आज़माऊँगी मुझे अब जीतनी ही है, हर इक हारी हुई बाज़ी बहुत अब हो गईं ये मन्तकें, ये झूटी लफ्फाज़ी
ज़िबह करना-सर काटना

नज़्म पार्ट 1 - उम्मीद

मैं तेरी मुन्तज़िर ता उम्र जानाँ रह भी सकती हूँ हर इक रंज ओ अलम, हर इक मुसीबत सह भी सकती हूँ है इस में ज़िन्दगी, मुझ को ये मरना भी गवारा है तुम्हारी इक नज़र जानां, मेरे दिल का सहारा है
रिहा हो कर तुम्हारी क़ैद से आख़िर कहाँ जाऊं तुम्हारा साथ हो, तो आसमाँ धरती पे ले आऊं तसव्वुर की ज़मीं का गोशा गोशा तुम ने घेरा है तुम्हारे रास्ते की ख़ाक में मेरा बसेरा है
बुझाऊं जितना, आतिश इश्क़ की उतना भड़कती है तुम्हारी जुस्तजू में ज़िंदगी जानां, धड़कती है मेरी राहों में ता हद्द ए नज़र उल्फ़त ही उल्फ़त है बताऊँ क्या, तुम्हारे हिज्र में भी कैसी लज़्ज़त है जुबां से शबनमी यादों के क़तरे चाट लेती हूँ ये घड़ियाँ हिज्र की, उम्मीद से मैं काट लेती हूँ
मगर उम्मीद की लड़ियों के मोती बिखरे जाते हैं कि दिल में गूंजते खद्शात मुझ को आज़माते हैं मुक़द्दर से ये दिल अब के दफ़ा जो जंग हारा है तमन्ना रेज़ा रेज़ा है, मोहब्बत पारा पारा है
मगर फिर सोचती हूँ, मात इन हालात की होगी सहर भी कोई तो आख़िर अँधेरी रात की होगी कभी कोई किरन सूरज का भी पैग़ाम लाएगी तजल्ली भी कभी तारीकियों में जगमगाएगी
कभी तो ज़ुल्मतों की रात से राहत तुलू होगी उफ़क़ से बदनसीबी क…

ज़िन्दगी मेरे लिए हो गई बोहताँ जानाँ

ज़िन्दगी मेरे लिए हो गई बोहताँ जानाँ मुझ पे कितना है बड़ा ये तेरा एहसाँ जानाँ
तेरे वादे, तेरी क़समें तेरी उल्फ़त, तेरा दिल हर हक़ीक़त है मेरे सामने उरियाँ जानाँ
इस कहानी में मेरे ख़ूँ की महक शामिल है और तेरा नाम है अफ़साने का उनवाँ जानाँ
दिल पे इक अब्र सा छाया था न जाने कब से आज तो टूट के बरसा है ये बाराँ जानाँ
इक वही बात जो कानों में कही थी तू ने दिल अभी तक है उसी बात का ख़्वाहाँ जानाँ
अब तो ता दूर कहीं कोई नहीं राह-ए-फ़रार खोल दे अब तो मेरे पाँव से जौलाँ जानाँ
बाद अज़ इसके बहुत तंग है जीना लेकिन फ़ैसला तर्क-ए-तअल्लुक़ का है आसाँ जानाँ
पहले दिल ज़ख़्मी था, अब रूह तलक ज़ख़्मी है तू ने क्या ख़ूब किया है मेरा दरमाँ जानाँ
अब यहाँ आ के जुदा होती हैं राहें अपनी अब क़राबत का नहीं कोई भी इमकाँ जानाँ
इश्क़ में अब वो जुनूँ है न वफ़ा में वो ग़ुरूर अब ये शै दुनिया में “मुमताज़” है अर्ज़ाँ जानाँ
बोहताँ-झूठा इल्ज़ाम, उरियाँ-नग्न, उनवाँ-शीर्षक, अब्र-बादल, बाराँ-बारिश, ख़्वाहाँ-इच्छुक, राह-ए-फ़रार-भागने का रास्ता, जौलाँ-बेड़ी, तर्क-ए-तअल्लुक़-रिश्ता तोड़ना, दरमाँ-इलाज, क़राबत-नजदीकी, इमकाँ-उम्मीद, अर्ज़ाँ-सस्ती

नज़्म-चाहत

तुम्हारी आरज़ू में रंग भरना चाहती हूँ मैं तुम्हें जी भर के जानाँ प्यार करना चाहती हूँ मैं
ये लंबा फ़ासला आख़िर मुझे कैसे गवारा हो तुम्हारी वहशतों को कुछ मेरे दिल का सहारा हो समेटूँ अपने दामन में तुम्हारे दिल के सन्नाटे निगाहों से मैं चुन लूँ सब तुम्हारी राह के काँटे
मेरी हर जुस्तजू तुम से शुरू हो, खत्म तुम पर हो तुम्ही हो ज़िन्दगी मेरी तुम्ही मेरे मुक़द्दर हो तुम्हारे काम न आए तो मेरी ज़िन्दगी क्या है हर इक सजदा मेरा बेकार है ये बंदगी क्या है
ख़ुशी ले लो मेरी मुझ को तुम अपने सारे ग़म दे दो मुझे इतनी जगह तो अपने दिल में कम से कम दे दो

गीत- इक बार ज़रा

माना कि हमारे बीच में अब वो प्यार का पागलपन न रहा वो इन्द्रधनुष से दिन न रहे, वो सपनों का सावन न रहा पर दिल कि अधूरी आस है ये तुम आ जाओ इक बार ज़रा
वो प्यार नहीं, तक़रार सही उल्फ़त न सही व्यापार सही राहत न सही उलझन ही सही बेचैन सी इक धड़कन ही सही खुशियाँ न सही आँसू ही सही दे जाओ कोई ग़म का तोहफ़ा
मेरी सुबहें अंधेरी हैं तुम बिन मेरा हर इक ख़्वाब अधूरा है हर एक सवाल सवाली है हर एक जवाब अधूरा है हर आस मिटे, विश्वास मिटे दे जाओ मुझे उल्फ़त की सज़ा
देखो तो हमारी रंजिश पर अब हँसते हैं दुनिया वाले उल्फ़त की तबाही पर ताने अब कसते हैं दुनिया वाले बदनामी की इस आग को अब दे जाओ थोड़ी और हवा