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ग़ज़ल - बरहना रक़्स करती है हवस वहशत की तानों पर

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बरहना रक़्स करती है हवस वहशत की तानों पर
त’अस्सुब के खिलौने बिकते हैं दिल की दुकानों पर
BARAHNA RAQS KARTI HAI HAWAS WAHSHAT KI TAANON PAR TA'ASSUB KE KHILAUNE BIKTE HAIN DIL KI DUKAANON PAR
परिंदों को ख़बर क्या, जाल है गंदुम के दानों पर शिकारी ने चढ़ा रक्खे हैं तीर अपनी कमानों पर PARINDON KO KHABAR KYA JAAL HAI GANDUM KE DAANON PAR SHIKAARI NE CHADHAA RAKKHE HAIN TEER APNI KAMAANON PAR
सभी मशकूक हैं, सबके दिलों पर ख़ौफ़ तारी है अजब सा बोझ इक रक्खा है इन्सानों की जानों पर SABHI MASHKOOK HAIN SAB KE DILON PAR KHAUF TAARI HAI AJAB SA BOJH YE RAKKHA HAI INSAANON KI JAANON PAR
किसी की नर्मगोई को कोई समझे न कमज़ोरी बनाता है निशाँ पानी जो गिरता है चट्टानों पर KISI KI NARMGOEE KO KOI SAMJHE NA KAMZORI BANAATA HAI NISHAAn PAANI JO GIRTA HAI CHATTANON PAR
कहाँ से हम कहाँ तक आ गए पैंसठ ही बरसों में सदी का बोझ है अब हाल के बोसीदा शानों पर KAHAN SE HAM KAHAN TAK AA GAE PAINSATH HI BARSON MEN SADI KA BOJH HAI AB HAAL KE BOSEEDA SHAANON PAR
ज़लालत, जुर्म, ग़ुरबत, भुखमरी, क़िस्मत है इंसाँ की है क़ैद इंसानियत महलों म…