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Showing posts from June 12, 2018

दश्त-ओ-सहरा-ओ-समन्दर सभी घर ले आए

दश्त-ओ-सहरा-ओ-समन्दर सभी घर ले आए अब के हम बाँध के क़दमों में सफ़र ले आए
कब तही दस्त हम आए हैं तेरी महफ़िल से ज़ख़्म ले आए, कभी ख़ून-ए-जिगर ले आए
हो रही थी अभी परवाज़ बलन्दी की तरफ़ लोग ख़ातिर के लिए तीर-ओ-तबर ले आए
कोई दावा, न इरादा, न तमन्ना, न हुनर हम में वो बात कहाँ है कि असर ले आए
है यहाँ कितनी तजल्ली कि नज़र क़ासिर है मेरे जज़्बात मुझे आज किधर ले आए
देखने भी न दिया जिसने नज़र भर के उसे हम कि हमराह वही दीदा-ए-तर ले आए
टूट कर बिखरे पर-ओ-बाल हवाओं में मगर  हम ने परवाज़ जो की, शम्स-ओ-क़मर ले आए

डर के तुग़ियानी से ठहरे हैं जो, कह दो उन से हम समन्दर में जो उतरे तो गोहर ले आए
अपनी राहों में सियाही का बसेरा था मगर हम अँधेरों से भी “मुमताज़” सहर ले आए

बाज़ी -मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ाँ

और फिर अंजाम वही हुआ...... एक बार फिर नतीजा वही निकला...... एक बार फिर वह यह बाज़ी हार गई। उसका दिल टुकड़ा टुकड़ा हो गया था और हर एक टुकड़ा ख़ून के आँसू रो रहा था। सच तो यह था....कि उसे अब तक यक़ीन नहीं हो रहा था कि अब वह उस की ज़िन्दगी में शामिल नहीं रहा था...... लेकिन सच तो सच था...... उस ने अपना ध्यान बँटाने के लिए टीवी ऑन कर लिया, कुछ देर तक यूँ ही चैनल पर चैनल बदलती रही, एक चैनल पर कॉमेडी फिल्म आ रही थी, वह वहीं रुक गई, “यह ठीक है, शायद कॉमेडी से उस की ट्रैजिडि का एहसास कुछ कम हो जाए...” उस ने सोचा। टीवी पर फिल्म चल रही थी, दरख़्शाँ की आँखें टीवी के स्क्रीन पर जमी थीं लेकिन वह फ़िल्म नहीं देख रही थी, उस के ज़हन में तो कोई और ही फ़िल्म चल रही थी। गुज़िश्ता ज़िन्दगी के तितर बितर से लम्हे उसकी आँखों के सामने रक़्स कर रहे थे....और हर लम्हे में एक सवाल पोशीदा था। क्यूँ.....क्यूँ.......क्यूँ........? और इस क्यूँ का जवाब उसे आज तक नहीं मिला था। दरख़्शाँ..... ख़ूबसूरत......ज़हीन......कामयाब..... अपने हज़ारों दीवानों के दिलों की मलिका.... उस की एक झलक पाने को लोग उस की राहों में पलकें बिछाए रहते थे। और वही दर…