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रतजगों से ख्वाब तक (मेरी किताब का पेश लफ़्ज़)‎

रतजगे और ख़्वाब मेरी ज़िन्दगी के साथ साथ चलते रहे हैं। कभी रतजगे ख़्वाब ओढ़ कर मिले, तो कभी ख़्वाबों की रौशनी रतजगों में ढल गई। जागती आँखों से ख़्वाब देखने का सिलसिला मेरे बचपन में ही शुरू हो गया था। ज़िन्दगी की हक़ीक़त की तमाज़त से घबरा कर अक्सर मैं ख़्वाबों के साये में पनाह ढूँढ लेती। उस वक़्त इन ख़्वाबों को पैकर में ढालना नहीं आता था मुझे। लेकिन वक़्त के साथ साथ ख़्वाबों की तरतीब में भी मतानत आने लगी, और मेरे मिज़ाज में भी, और फिर ये ख़्वाब शेरों की शक्ल में ढल कर काग़ज़ पर बिखरने लगे। वक़्त का कारवाँ कभी रुकता नहीं है, और ज़िन्दगी का सफ़र हर हाल में जारी रहता है। मेरी ज़िन्दगी का सफ़र भी लम्हा दर लम्हा, माह दर माह, और फिर साल दर साल जारी रहा, और इस के साथ ही साथ हक़ीक़तों की तमाज़त शिद्दत इख़्तियार करती गई। वक़्त का कारवाँ जाने किन किन मोड़ों से गुज़र कर आगे बढ़ता गया, जाने कितने हमसफ़र मिले, जाने कितने बिछड़ते रहे, लेकिन मेरे ख़्वाबों के साये मेरे साथ साथ चलते रहे। शायद यही वजह थी कि मेरा वजूद हक़ीक़त की तमाज़त में झुलस कर खाक न होने पाया, लेकिन ख़्वाबों के सायों की ठंडक इस आंच में जल गई और मेरे ख़्वाब भी सुलग उठे, और …