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ग़ज़ल - बातों में सौ-सौ ख़्वाब सजे थे, कितना सुनहरा था किरदार

बातों में सौ-सौ ख़्वाब सजे थे, कितना सुनहरा था किरदार जो थी नक़ाब के पीछे सूरत वो भी हुई ज़ाहिर इस बार BAATON MEN SAU SAU KHWAAB SAJE THE, KITNA SUNAHRA THA KIRDAAR JO THI NAQAAB KE PEECHHE SOORAT WO BHI HUI ZAAHIR IS BAAR
आबले अपने पाँव के रो-रो करते हैं हर पल इसरार गुज़रेंगे कल भी लोग यहाँ से करते चलो राहें हमवार AABLE APNE PAANV KE RO RO KARTE HAIN HAR PAL ISRAAR GUZRENGE KAL BHI LOG YAHAN SE KARTE CHALO RAAHEN HAMWAAR
सोई क़यामत नींद से उठ कर देख ले जैसे एक झलक प्यासी ज़मीन, झुलसते मंज़र, धूप में जलते हैं अशजार SOI QAYAAMAT NEEND SE UTH KE DEKH LE JAISE EK NAZAR PYAASI ZAMEEN JHULASTE MANZAR DHOOP MEN JALTE HAIN ASHJAAR
कैसे कटेगा कल का उजाला, कैसे ढलेगी रात सियाह जागती आँखें देख रही हैं रात की वुस’अत के उस पार KAISE KATEGA KAL KA UJAALA KAISE DHALEGI RAAT SIYAAH JAAGTI AANKHEN DEKH RAHI HAIN RAAT KI WUS'AT KE US PAAR
ले तो लिया है ख़ुद अपने सर जुर्म-ए-मोहब्बत, जुर्म-ए-ख़ुलूस कोस रहे हैं अब ख़ुद को ही, कर तो लिया हमने इक़रार LE TO LIYA HAI KHUD APNE SAR JURM E MOHABBAT JURM E KHULOOS KOS RAHE HAIN…

ग़ज़ल - भटकती फिर रही है मुस्तक़िल अब दश्तगाहों में

भटकती फिर रही है मुस्तक़िल अब दश्तगाहों में अजब अंदाज़ से है ज़िन्दगी अटकी दोराहों में BHATAKTI PHIR RAHI HAI MUSTAQIL ABDASHTGAAHON MEN AJAB ANDAAZ SE HAI ZINDAGI ATKI DORAAHON MEN
पलट कर अपने माज़ी को कभी आवाज़ देती हूँ कभी घबरा के खो जाती हूँ मुस्तक़बिल की बाहों में PALAT KAR APNE MAAZI KO KABHI AAWAZ DETI HOON KABHI GHABRA KE KHO JAATI HOON MUSTAQBIL KI BAAHON MEN
अमीरों में हमारा कोई भी सानी नहीं साहब ज़मीं क़दमों तले है आसमाँ है अपनी बाहों में AMEERON MEN HAMAARA KOI BHI SAANI NAHIN SAAHAB ZAMEEN QADMON TALE HAI AASMAAN HAI APNI BAAHON MEN
चुभन से मंज़रों की डर के आँखें बंद तो कर लीं चुभे जाते हैं मंज़र ख़्वाब के अबके निगाहों में CHUBHANSEMANZARONKIDARKE AANKHEN BAND TO KAR LEEN CHUBHE JAATE HAIN MANZAR KHWAAB KE AB KE NIGAAHON MEN
करम कुछ वक़्त का है और कुछ हालात की मर्ज़ी हमारा ज़िक्र भी आ ही गया आख़िर तबाहों में KARAM KUCHH WAQT KA HAI AUR KUCHH HAALAAT KI MARZI HAMAARA ZIKR BHIAA HIGAYA AAKHIR TABAAHON MEN
कमी कोई न रह जाए कि जश्न-ए-मर्ग-ए-हसरत है चराग़ाँ हो रहा है आज दिल की ख़ानक़ाहों में KAMI KOI NA RE…

ग़ज़ल - ख़्वाबों की रसधार में अक्सर भीगा करती हूँ

नश्शे में रहती हूँ, क्या क्या सोचा करती हूँ होश नहीं ख़ुद मुझ को भी मैं क्या क्या करती हूँ NASHE MEN REHTI HOON KYA KYA SOCHA KARTI HOON HOSH NAHIN KHUD MUJH KO BHI MAIN KYA KYA KARTI HOON
ख़्वाबों की रसधार में अक्सर भीगा करती हूँ जागती आँखों से अब सपना देखा करती हूँ KHWAABON KI RASDHAAR MEN AKSAR BHEEGA KARTI HOON JAAGTI AANKHON SE AB SAPNA DEKHA KARTI HOON
शाम ढले वहशत की गली में भटका करती हूँ बोझ मैं दिल का यूँ भी अक्सर हल्का करती हूँ SHAM DHALE WAHSHAT KI GALI MEN BHATKA KARTI HOON BOJH ZEHN KA YUN BHI AKSAR HALKA KARTI HOON
आँसू, हसरत, ग़म, नग़्मे, ग़ज़लें, नज़्में, अशआर लोगों में कुछ ख़्वाब अधूरे बाँटा करती हूँ AANSOO HASRAT GHAM WAHSHAT GHAZLEN NAZMEN ASHAAR LOGON MEN KUCHH KHWAAB ADHOORE BAANTA KARTI HOON
हसरत की पड़ जाए नज़र तो रूह भी जल जाए अपने दिल की हर हसरत से पर्दा करती हूँ HASRAT KI PAD JAAE NAZAR TO ROOH BHI JAL JAAEY APNE DIL KI HAR HASRAT SE PARDA KARTI HOON
बादल बन कर बरसा करता है वो इक एहसास उस के साए को भी अब तो सजदा करती हूँ BAADAL BAN KAR BARSA KARTA HAI WO IK EHSAAS US KE SAAEY KO …

ग़ज़ल - कैसा अजब ख़ुमार है, कैसा ये ख़्वाब है

कैसा अजब ख़ुमार है, कैसा ये ख़्वाब है इस लम्स से तो रूह तलक आब आब है KAISA AJAB KHUMAAR HAI KAISA YE KHWAAB HAI IS LAMS SE TO ROOH TALAK AAB AAB HAI
उल्फ़त करोगे सर्फ़ तो उल्फ़त कमाओगे रिश्तों की इस किताब का सीधा हिसाब है ULFAT KAROGE SARF TO ULFAT KAMAAOGE RISHTON KI IS KITAAB KA SEEDHA HISAAB HAI
बीनाई ज़ख़्म ज़ख़्म, निगाहें लहू लहू आँखों ने अबके देख लिया कैसा ख़्वाब है BEENAAI ZAKHM ZAKHM NIGAAHEN LAHU LAHU AANKHON NE AB KE DEKH LIYA KAISA KHWAAB HAI
नाआशना है ज़ीस्त की हर एक इबारत नाख़्वांदा हैं हुरूफ़, ये कैसी किताब है NAA'AASHNA HAI ZEEST KI HAR EK IBAARAT NAAKHWAANDA HAIN HUROOF YE KAISI KITAAB HAI
जलती है सांस सांस, सुलगता है सारा तन लगता है मुझ से लिपटा हुआ इक शेहाब है JALTI HAI SAANS SAANS SULAGTA HAI SAARA TAN LAGTA HAI MUJH SE LIPTA HUA IK SHEHAAB HAI
भटका रहा है दूर तलक मुझ को रात-दिन सहरा-ए-ज़ात में जो जुनूँ का सराब है BHATKA RAHA HAI DOOR TALAK MUJH KO RAAT DIN SEHRA E ZAAT MEN JO JUNOON KA SARAAB HAI
“मुमताज़” जी संभाल के रखिए मता-ए-ज़ात चलिये ज़रा संभल के, ज़माना ख़राब है 'MUMTAZ' JI SA…

ग़ज़ल - हम भी पुराने दौर के आसार हो गए

एहसास के खंडर सभी मिस्मार हो गए हम भी पुराने दौर के आसार हो गए EHSAASKEKHANDARSABHIMISMAAR HO GAEY HAM BHI PURAANE DAUR KE AASAR HO GAEY
हम से हमारा आप भी ख़ुद अजनबी हुआ ज़ाहिर जो हम पे इश्क़ के असरार हो गए HAM SE HAMAARA AAP BHI KHUD AJNABEE HUA ZAHIR JO HAM PE ISHQ KE ASRAAR HO GAEY
राहत ये जाने कैसी थी, कैसा सुकून था आराम इस क़दर था कि बीमार हो गए RAAHAT YE JAANE KAISI THI KAISA SUKOON THA AARAM IS QADAR THA KE BEEMAAR HO GAEY
इक हादसे ने ख़्वाब-ए-फ़ुसूँ तोड़ दिया फिर फिर ज़िन्दगी की फिक्र से दो-चार हो गए IK HAADSE NE KHWAAB E FUSOON TOD DIYA PHIR PHIR ZINDAGI KI FIKR SE DO CHAAR HO GAEY
दहशत, गुनाह, मक्र, दग़ा, ज़ुल्म, वहशतें घबरा के इस ज़माने से अबरार हो गए DEHSHAT GUNAAH MAKR O DAGHAA ZULM WAHSHATEN GHABRA KE IS ZAMAANE SE ABRAAR HO GAEY
करवट ज़मीं की बस्ती की बस्ती निगल गई कल घर थे, आज मलबे का अंबार हो गए KARWAT ZAMEEN KI BASTI KI BASTI NIGAL GAI KAL GHAR THE AAJ MALBE KA AMBAAR HO GAEY
“मुमताज़” ये ज़माने की मतलब परस्तियाँ खाए हैं इतने ज़ख़्म कि हुशियार हो गए 'MUMTAZ' YE ZAMAANE KI MATLAB PARASTI…

ग़ज़ल - चार सू तारीकियाँ, सब हसरतें वीरान हैं

चार सू तारीकियाँ, सब हसरतें वीरान हैं जिस्म के अंधे नगर के रास्ते सुनसान हैं chaar soo taarikiyan sab hasraten veeraan hain jism ke andhe nagar ke raaste sunsaan hain
जीत जाते हम मगर तलवार हम ने फेंक दी ख़ुद ही हम अपनी शिकस्त-ए-ज़ात का ऐलान हैं Jeetjaatehammagartalwarhamnephenkdi khud hi ham apni shikast e zaat ka ailaan hain
चार क़दमों पर है मंज़िल, अब तुझे ये क्या हुआ क्यूँ नज़र धुँधला गई है, क्यूँ ख़ता औसान हैं chaar qadmon par hai manzil ab tujhe ye kya hua kyun nazar dhundla gai hai kyun khata ausaan hain
आरज़ू, रिश्ते, मोहब्बत, रंज-ओ-ग़म, एहसास, ख़्वाब इस किताब-ए-ज़िन्दगी के कितने ही उनवान हैं aarzoo rishte mohabbat ranj o gham ehsaas khwaab is kitaab e zindagi ke kitne hi unwaan hain
कैसी साहिर है ये हसरत, कैसा ये एहसास है वो उधर हैरतज़दा हैं, हम इधर हैरान हैं kaisi saahir hai ye hasrat kaisa ye ehsaas hai wo udhar hairatzada hain ham idhar hairaan hain
फिर तसव्वर उड़ चला, तख़ईल फिर आज़ाद है बिखरी ज़ंजीरें हैं और ख़ाली पड़े ज़िंदान हैं phir tasawwar ud chala takheel phir aazad hai bikhri zanjeeren hain aur …

सूनामी (TSUNAMI) (2011 में जापान में आई भयंकर सूनामी की खबर पढ़ कर ये नज़्म कही थी)

उठा वो क़हर मौजों का जो धरती की तरफ़ दौड़ा क़यामतख़ेज़ मौजों ने हर इक दीवार को तोड़ा लरज़ उट्ठी ज़मीं, हर ओर इक हंगाम तारी है बरहना मौत का ये रक़्स चारों सिम्त जारी है UTHA WO QEHR MAUJON KA JO DHARTI KI TARAF DAUDA QAYAMAT KHEZ MAUJON NE HAR IK DEEWAR KO TODA LARAZ UTTHI ZAMEEN HAR OR IK HANGAAM TAARI HAI BARAHNA MAUT KA YE RAQS CHAARON SIMT JAARI HAI
तमाशा मौत का, रक़्स-ए-ज़मीं, मौजों का हंगामा ये क़ुदरत का ग़ज़ब, ये डूबती लाशों का हंगामा ये जलते घर के घर, जलती हुई ये शहर की राहें क़यामत का रिएक्टर, ये ख़ुदा के क़हर की राहें ये ज़हन-ए-आदमी में छाई ज़ुल्मत का नतीजा हैं ये इंसाँ के ख़ुदा बनने की चाहत का नतीजा हैं TAMASHA MAUT KA, RAQS E ZAMEEN, MAUJON KA HANGAAMA YE QUDRAT KA GHAZAB YE DOOBTI LAASHON KA HANGAAMA YE JALTE GHAR KE GHAR JALTI HUI YE SHEHR KI RAAHEN QAYAMAT KA REACTOR YEKHUDA KE QEHR KI RAAHEN YE ZEHN E AADMI MEN CHHAI ZULMAT KA NATEEJA HAIN YE INSAAN KE KHUDA BAN NE KI CHAAHAT KA NATEEJA HAIN
यहाँ सब कोशिशें नाकाम हैं, उम्मीद बेकस है कि इंसाँ देख लो क़ुदरत के आगे कितना बेबस है ज़मीं की एक ही लग़्ज़िश ने वो…

ग़ज़ल - कौन है तू मेरा, क्या तुझ से मेरा रिश्ता है

कौन है तू मेरा, क्या तुझ से मेरा रिश्ता है अजनबी हो के भी अपना सा मुझे लगता है KAUN HAI TU MERA, KYA MUJH SE TERA RISHTA HAI AJNABEE HO KE BHI APNA SA MUJHE LAGATA HAI
एक एहसास मुझे महव किए रहता है इक ख़यालों के समंदर में ये दिल डूबा है EK EHSAAS MUJHE MEHV KIYE REHTA HAI IK KHAYAALON KE SAMANDAR MEN YE DIL DOOBA HAI
है तलबगार समंदर की मेरी तश्नालबी होंठ तो होंठ, मेरी रूह तलक तश्ना है HAI TALABGAAR SAMANDAR KI MERI TASHNALABI HONT TO HONT MERI ROOH TALAK TASHNA HAI
इस उजाले ने तो बीनाई ही ले ली मेरी मैं ने सदियों से उजाला जो नहीं देखा है IS UJAALE NE TO BEENAAI HI LE LI MERI MAIN NE SADIYON SE UJAALA JO NAHIN DEKHA HAI
कैसा आसेब मेरे दिल को लगा है अबके कैसा जादू है, अजब दिल पे नशा छाया है KAISA AASEB MERE DIL KO LAGA HAI AB KE KAISA JAADU HAI, AJAB DIL PE NASHA CHHAYA HAI
एक एहसास जो लिपटा है मेरी रूह के साथ मेरी हस्ती से मुझे दूर लिए जाता है EK EHSSAS JO LIPTA HAI MERI ROOH KE SAATH MERIHASTISEMUJHEDOORLIYEJAATAHAI
आज “मुमताज़” ने डाली है हवाओं पे कमंद पैरहन जिस्म का तख़ईल को पहनाया है AAJ 'MUMTA…

ग़ज़ल - मुक़द्दर से ये अबके बार दिल जो जंग हारा है

मुक़द्दर से ये अबके बार दिल जो जंग हारा है तमन्ना रेज़ा रेज़ा है, मोहब्बत पारा पारा है MUQADDAR SE YE AB KE BAARDIL JO JANG HAARA HAI TAMANNA REZA REZA HAI MOHABBAT PARA PARA HAI
बड़ी मेहनत से जश्न-ए-आरज़ू के वास्ते जानाँ तेरी यादों से मैं ने दिल की गलियों को सँवारा है BADI MEHNAT SE JASHN E AARZOO KE WAASTE JAANAN TERI YAADON SE MAIN NE DIL KI GALIYON KO SANWAARA HAI
पिये जाते है हम कब से समंदर अश्क का लेकिन मिटेगी तिश्नगी कैसे, ये पानी भी तो खारा है PIYE JAATE HAIN KAB SE HAM SAMANDAR ASHK KA PHIR BHI MITEGI TASHNAGI KAISE YE PAANI BHI TO KHARA HAI
कभी तो आके फिर इक बार वो राहत ज़रा दे दे तुझे ऐ ज़िन्दगी, दिल की जलन ने फिर पुकारा है KABHI TO AA KE PHIR IK BAAR WO RAAHAT ZARA DE DE TUJHE AY ZINDAGI DIL KI JALAN NE PHIR PUKAARA HAI
मुनासिब है अभी हम हौसले अपने बचा रक्खें भटकती है अभी कश्ती, अभी डूबा किनारा है MUNASIB HAI ABHI HAM HAUSLE APNE BACHA RAKHEN BHATAKTI HAI ABHI KASHTI ABHI DOOBA KINAARA HAI
गुज़रता ही नहीं है ज़िन्दगी का एक वो लम्हा मोहब्बत का वो इक लम्हा जो शो’ला है, शरारा है GUZARTA HI NAHIN…

ग़ज़ल - फूट कर वो भी तो रोया होगा

फूट कर वो भी तो रोया होगा ख़ून-ए-दिल रंग तो लाया होगा PHOOT  KAR  WO  BHI  TO  ROYA   HOGA KHOON  E  DIL  RANG  TO LAAYA  HOGA
कर लिया तर्क-ए-तअल्लुक़ लेकिन क्या मगर चैन से सोया होगा KAR LIYA TARK-E-TA’ALLUQ LEKIN KYA  MAGAR  CHAIN  SE  SOYA     HOGA
ख़ुद सिमट कर कहीं अपने अंदर उसने बरसों तुम्हें सोचा होगा KHUD SIMAT KAR KAHIN APNE  ANDAR "US NE BARSON TUMHEN SOCHA HOGA”
मेरी वहशत का उसकी चाहत का एक अंजान सा रिश्ता होगा MERI WAHSHAT KA US KI CHAAHAT KA EK   ANJAAN   SA   RISHATAA        HOGA
आग में हम ही नहीं झुलसे हैं उसकी आँखों में भी दरिया होगा   AAG MEN  HAM HI  NAHIN JHULSE HAIN US KI AANKHON MEN BHI DARIYA HOGA
मेरी आँखों में उतर कर उसने इक हसीं ख़्वाब तो देखा होगा MERI AANKHON MEN UTAR KAR US NE WO HASEEN KHAAB TO DEKHA   HOGA
ज़ख़्म तपका तो हुआ है एहसास उसका दिल ज़ोर से तड़पा होगा ZAKHM  JAB  TAPKA  TO  EHSAAS  HUA US  KA  DIL  ZOR  SE  TADPA         HOGA
दे के “मुमताज़” को ग़म का तोहफ़ा रात भर वो भी न सोया होगा DE  KE 'MUMTAZ' KO GHAM KA TOHFA
RAAT  BHAR  WO BHI    NA SOYA HOGA

ग़ज़ल - इस दर्द की शिद्दत से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

इस दर्द की शिद्दत से गुज़र क्यूँ नहीं जाते बरहक़ है अगर मौत तो मर क्यूँ नहीं जाते AB DARD KI SHIDDAT SE GUZAR KYUN NAHIN JAATE BAR HAQ HAI AGAR MAUT TO MAR KYUN NAHIN JAATE
कब तक मैं संभालूँ ये मेरी ज़ात के टुकड़े रेज़े ये हर इक सिम्त बिखर क्यूँ नहीं जाते KAB TAK MAIN SAMBHALOON YE MERI ZAAT KE TUKDE REZE YE HAR IK SIMT BIKHAR KYUN NAHIN JAATE
क़ातिल भी, गुनहगार भी, मुजरिम भी हमीं क्यूँ इल्ज़ाम किसी और के सर क्यूँ नहीं जाते QAATIL BHI GUNAHGAAR BHI MUJRIM BHI HAMEEN KYUN ILZAAM KISI AUR KE SAR KYUN NAHIN JAATE
डरते हो तो अब तर्क-ए-इरादा भी तो कर लो हिम्मत है तो उस पार उतर क्यूँ नहीं जाते DARTE HO TO AB TARK E IRAADA BHI TO KAR DO HIMMAT HAI TO US PAAR UTAR KYUN NAHIN JAATE
अब दर्द की शिद्दत भी मेरा इम्तेहाँ क्यूँ ले अब ज़ख़्म ये हालात के भर क्यूँ नहीं जाते AB DARD KI SHIDDAT BHI MERA IMTEHAAN KYUN LE AB ZAKHM YE HAALAT KE BHAR KYUN NAHIN JAATE
ये सर्द तमन्नाएँ कहीं जान न ले लें एहसास के शो’लों से गुज़र क्यूँ नहीं जाते YE SARD TAMANNAEN KAHIN JAAN NA LE LEN EHSAAS KE SHOLON SE GUZAR KYUN NAHIN JAATE
दिल फिर…

ग़ज़ल - 6 (ज़ुल्म को अपनी क़िस्मत माने)

ज़ुल्म को अपनी क़िस्मत माने, दहशत को यलग़ार कहे अपने हक़ से भी ग़ाफ़िल हो, कौन उसे बेदार कहे ZULM KO APNI QISMAT MAANE DAHSHAT KO YALGHAAR KAHE APNE HAQ SE BHI GHAAFIL HO KAUN USE BEDAAR KAHE
ज़ख़्मों को बेक़ीमत समझे, अश्कों को ऐयार कहे ऐसे बेपरवा से अपने दिल की जलन बेकार कहे ZAKHMON KO BEQEEMAT SAMJHE ASHKON KO AIYYAR KAHE AISE BEPARWAAH SE APNE DIL KI JALAN BEKAAR KAHE
अपना अपना ज़ौक़-ए-नज़र है, अपनी अपनी फ़ितरत है मैं इज़हार-ए-हाल करूँ तो तू उसको तक़रार कहे APNA APNA ZAUQ E NAZAR HAI APNI APNI FITRAT HAI MAIN IZHAAR E HAAL KARUN TO TU US KO TAQRAAR KAHE
सीख गया है जीने के अंदाज़ जहान-ए-हसरत में हर इक बात इशारों में अब तो ये दिल-ए-हुशियार कहे SEEKH GAYA HAI JEENE KE ANDAAZ JAHAAN E HASRAT MEN HAR IK BAAT ISHAARON MEN AB TO YE DIL E HUSHIYAAR KAHE
जाने दो “मुमताज़” मैं क्या हूँ, पागल हूँ, सौदाई हूँ मैं झूठी, मेरी बातें झूठी, मानो जो अग़यार कहे JAANE DO 'MUMTAZ', MAIN KYA HOON, PAAGAL HOON SAUDAAI HOON
MAIN JHOOTI MERI BAATEN JHOOTI, MAANO JO AGHYAAR KAHE

ग़ज़ल - लम्हा लम्हा ज़िन्दगी का

मेरी ये ग़ज़ल उर्दू मैगज़ीन "इंशा" में छप कर मक़बूल हो चुकी है। ये ग़ज़ल आप लोगों के लिए पेश-ए-ख़िदमत है

लम्हा लम्हा ज़िन्दगी का इक सज़ा होने लगा अब तो हर इक दर्द-ए-पैहम लादवा होने लगा LAMHA LAMHA ZINDAGI KA IK SAZAA HONE LAGA AB TO HAR  IK DARD E PAIHAM LADAVAA HONE LAGA
रास्ते की जुस्तजू जब की तो मंज़िल मिल गई मंज़िलें ढूँढ़ीं तो रस्ता नारसा होने लगा RAASTE KI JUSTJU JAB KI TO MANZIL MIL GAI MANZILEN DHOONDIN TO RASTAA NARASAA HONE LAGA
ऐ मोहब्बत तेरे इस एहसान का बस शुक्रिया अब तो तेरे नाम से भी ख़ौफ़ सा होने लगा AEY MOHABBAT TERE IS EHSAAN KA BAS SHUKRIYA AB TO TERE NAAM SE BHI KHAUF SA HONE LAGA
करवटें लेता है दिल में फिर से इक तूफ़ान सा हम अभी मुश्किल से संभले थे, ये क्या होने लगा KARWATEN LETA HAI DIL MEN PHIR SE IK TOOFAAN SA HAM ABHI MUSHKIL SE SAMBHLE THE YE KYA HONE LAGA
ये रबाब-ए-दिल तो इक मुद्दत हुई, ख़ामोश है क्यूँ ये साज़-ए-बेसदा नग़्मासरा होने लगा YE RABAAB E DIL TO IK MUDDAT HUI KHAAMOSH HAI KYUN YE SAAZ E BESADAA NAGHMA SARAA HONE LAGA
एक हल्का सा तबस्सुम लब पे आया था कि बस दर्द-ओ-ग़म म…