गीत- इक बार ज़रा


माना कि हमारे बीच में अब वो प्यार का पागलपन न रहा
वो इन्द्रधनुष से दिन न रहे, वो सपनों का सावन न रहा
पर दिल कि अधूरी आस है ये
तुम आ जाओ इक बार ज़रा

वो प्यार नहीं, तक़रार सही
उल्फ़त न सही व्यापार सही
राहत न सही उलझन ही सही
बेचैन सी इक धड़कन ही सही
खुशियाँ न सही आँसू ही सही
दे जाओ कोई ग़म का तोहफ़ा

मेरी सुबहें अंधेरी हैं तुम बिन
मेरा हर इक ख़्वाब अधूरा है
हर एक सवाल सवाली है
हर एक जवाब अधूरा है
हर आस मिटे, विश्वास मिटे
दे जाओ मुझे उल्फ़त की सज़ा

देखो तो हमारी रंजिश पर
अब हँसते हैं दुनिया वाले
उल्फ़त की तबाही पर ताने
अब कसते हैं दुनिया वाले
बदनामी की इस आग को अब
दे जाओ थोड़ी और हवा

Comments

Popular posts from this blog

फ़र्श था मख़मल का, लेकिन तीलियाँ फ़ौलाद की

भड़कना, कांपना, शो'ले उगलना सीख जाएगा

किरदार-ए-फ़न, उलूम के पैकर भी आयेंगे