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July 25, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - ऐसा जमूद रूह पे तारी हुआ कि बस

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ऐसा जमूद रूह पे तारी हुआ कि बस कुछ यूँ चली बहार में ठंडी हवा, कि बस
AISA JAMOOD ROOH PE TAARI HUA KE BAS KUCHH YUN CHALI BAHAAR MEN THANDI HAWA KE BAS
घबरा के इब्तेदा ही में क्यूँ कर दिया कि बस “कुछ और भी सुनोगे मेरा माजरा कि बस” GHABRA KE IBTEDA HI MEN KYUN KEH DIYA KE BAS "KUCHH AUR BHI SUNOGE MERA MAAJRA KE BAS"
हम तो किसी सितम का गिला भी न कर सके कुछ इस तरह से उसने कहा मुद्दुआ कि बस HAM TO KISI SITAM KA GILA BHI NA KAR SAKE KUCHH IS TARAH SE US NE KAHA MUDDA'AA KE BAS
जश्न-ए-क़ज़ा-ए-मेहर-ए-मुनव्वर था शाम को ऐसी चमक रही थी उरूसी क़बा कि बस JASHN E QAZAA E MEHR E MUNAWWAR THA SHAM KO AISI CHAMK RAHI THI UROOSI QABAA KE BAS
मजबूरियों का कोह-ए-गराँ तोड़ते हुए ऐसे हुए शिकस्ता मेरे दस्त-ओ-पा, कि बस MAJBOORIYON KA KOH E GARAA.N TODTE HUE AISE HUE SHIKASTA MERE DAST O PAA KE BAS
गिर कर बलन्दियों से ज़मीं पर बिखर गए टूटा ख़ुमार-ए-ज़ात तो ऐसा लगा कि बस GIR KAR BALANDIYON SE ZAMEE.N PAR BIKHAR GAEY TOOTA KHUMAAR E ZAAT TO AISA LAGA KE BAS
उस की इनायतें भी अज़ाबों से कम न थीं वो इंतेहा ख़ुलूस की, कहन…