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नज़्म – टूटी कश्ती

तेरा वादा भी इक क़यामत है ज़िंदगी मेरी कमनसीब रही टूट कर गिरता हुआ जैसे कि तारा कोई यूँ तेरे वादे से लिपटी हुई उम्मीदें हैं
कश्तियाँ टूटी हैं टकरा के जिन जज़ीरों से मौत की अंधी बस्तियों के वो हमसाए हैं दिल के आईने की बिखरी हुई किरचों की चुभन है शादीद इतनी कि जलने लगा अब सारा बदन
मेरे महबूब मेरे टीसते ज़ख़्मों की क़सम तेरे आने का गुमाँ होता है हर आहट पर जब हिला देती हैं ज़ंजीर हवाएँ दर की लौट आती है नज़र गश्त लगा कर मायूस और फिर अपनी उम्मीदों पे हंसी आती है
नाख़ुदा मेरे कभी वक़्त अगर मिल जाए दो घड़ी मुझ को बताना तो सही टूटी कश्ती से समंदर को कैसे पार करूँ

जज़ीरों से – द्वीपों से,  हमसाए – पड़ोसी, नाख़ुदा – मल्लाह 

उल्फ़तों को धो रहे हो

उल्फ़तों को धो रहे हो कितनी नफ़रत बो रहे हो
होश हमवतनो संभालो नींद कैसी सो रहे हो
बन रहे हो क्यूँ तमाशा अब भरम भी खो रहे हो
हैं बुरी दुनिया की नज़रें बेरिदा क्यूँ हो रहे हो
दुश्मनी का बोझ भारी क्यूँ सरों पर ढो रहे हो
चुप रहो “मुमताज़ नाज़ाँ”
किसके आगे रो रहे हो 

क्या क्या अजीब रंग बदलती है ज़िन्दगी

क्या क्या अजीब रंग बदलती है ज़िन्दगी हर लम्हा नए रूप में ढलती है ज़िन्दगी
तू जब चले तो तेरी हर आहट के साथ साथ ख़ामोश, दबे पाओं से चलती है ज़िन्दगी
साँसों की आँच, जिस्म की लौ और वफा की आग इक शमअ की मानिंद पिघलती है ज़िन्दगी
तेरा सुकूत, तेरी हँसी, तेरी गुफ़्तगू तेरे लबों की छाँव में पलती है ज़िन्दगी
लो शब हुई तमाम, नई सहर आ गई बेदार हो चुकी है संभलती है ज़िन्दगी
गुज़रा है जिस तरफ़ से मोहब्बत का क़ाफ़िला उस रास्ते की ख़ाक में पलती है ज़िन्दगी
मुट्ठी में बंद रेत फिसल जाए जिस जगह हाथों से लम्हा लम्हा फिसलती है ज़िन्दगी
“मुमताज़” तेरा प्यार, मेरी रूह का शिगाफ़
आतिशफ़िशान-ए-दर्द में जलती है ज़िन्दगी 

ज़ख़्मी रिश्तों का अभी बार उठाए चलिये

ज़ख़्मी रिश्तों का अभी बार उठाए चलिये राह दुश्वार सही, साथ निभाए चलिये
कौन जाने कहाँ ले जाए ये आवारा मिज़ाज राह में कुछ तो निशानात बनाए चलिये
और कुछ मरहले आएँगे, ज़रूरत होगी मशअलें दिल की अभी और जलाए चलिये
क्या ख़बर रूह को फिर दर्द मिले या न मिले हाल के कर्ब को सीने से लगाए चलिये
जब मक़ाम आए बिछड़ने का तो तकलीफ़ न हो बदगुमानी भी कोई दिल में छुपाए चलिये
मंज़िलें और भी हैं ज़ीस्त की राहों में अभी जब तक आवाज़ कोई दिल को बुलाए, चलिये
कब बिछड़ जाए कोई, कौन कहाँ मिल जाए हर क़दम कोई नया दीप जलाए चलिये
आगे “मुमताज़” अभी सेहरा की वुसअत होगी
अश्क थोड़े अभी आँखों में छुपाए चलिये 

शोलानुमा हैं ज़ख़्म हमारे, लाखों तूफ़ाँ आहों में

शोलानुमा हैं ज़ख़्म हमारे, लाखों तूफ़ाँ आहों में ज़ुल्म-ओ-सितम से हमको झुका ले कौन है ऐसा शाहों में
घुस आया है अबके दुश्मन शायद शहर पनाहों में आओ चलें, तहक़ीक़ करें, क्या उलझे हो अफ़वाहों में
क़िस्मत के ये पेच हैं या फिर वक़्त-ए-रवाँ की बेमेहरी आ बैठे हैं राहों पर जो रहते थे आलीजाहों में
जाने कहाँ था ध्यान हमारा, कौन सी राह पे आ निकले ऐसे भटके अबके हम, अब अटके हैं दोराहों में
भूला भटका काश कभी वो मेरे घर तक आ जाए दिल में है बस एक तमन्ना, इक तस्वीर निगाहों में
राह कठिन है, वक़्त बुरा है, पहले क्या मालूम न था? थामा है जब हाथ तो मेरे साथ चलो इन राहों में
एक नई मंज़िल की जानिब जारी है फिर आज सफ़र एक सुनहरे मुस्तक़बिल के ले कर ख़्वाब निगाहों में
ग़म को सजा कर पेश किया है, दर्द को यूँ वुसअत दी है पलकों पर “मुमताज़” सितारे, बाद-ए-बहाराँ आहों में

शोलानुमा – लपट के जैसे, शहर पनाहों में – शहर की दीवार के अंदर, वक़्त-ए-रवाँ – गुज़रता हुआ वक़्त, बेमेहरी – बेरुख़ी, आलीजाहों में – ऊंचे मरतबे वाले लोगों में, मुस्तक़बिल – भविष्य, वुसअत – विस्तार, बाद-ए-बहाराँ – वासंती हवा 

रुख़ हवाओं का किधर है, और मेरी मंज़िल कहाँ

रुख़ हवाओं का किधर है, और मेरी मंज़िल कहाँ इस तलातुम में न जाने खो गया साहिल कहाँ
रात का वीरान मंज़र, रास्ते ख़ामोश थे दूर देता था सदाएं जाने इक साइल कहाँ
जल रही है रूह तक, दिल थक गया है, ज़हन कुंद ये कहाँ बेहिस सी ज़िद, वो जज़्बा ए कामिल कहाँ
उलझनें कैसी, कहाँ वो उल्फतें, वो रंजिशें वो हमारी ज़िन्दगी में रह गया शामिल कहाँ
और तो सब कुछ है, राहत है, सुकूँ भी है मगर वो मचलती आरज़ू, वो ज़ीस्त का हासिल कहाँ
उस ने जो सोचा, जो चाहा, हम वो सब करते रहे हम भला उस के इरादों से रहे ग़ाफिल कहाँ
इक निगाह ए मेहर ओ उल्फ़त, इक नज़र, इक इल्तेफ़ात ये मगर मेरी गुजारिश ग़ौर के क़ाबिल कहाँ
दर्द जब हद से बढ़ा तो हर तड़प जाती रही रूह तक ज़ख़्मी हो जब, तो फिर सिसकता दिल कहाँ
अब तअस्सुब की लपट में क़ैद है सारा वतन मुंह छुपाए हैं पड़े ये आलिम ओ फ़ाज़िल कहाँ
आसमाँ की सिम्त हम देखा करें उम्मीद से हम गुनहगारों प् होता है करम नाज़िल कहाँ
एक जुम्बिश दें नज़र को तो ख़ुदाई हो निसार रह गए इस दौर में "मुमताज़" वो कामिल कहाँ

तलातुम-लहरों की हलचल, साहिल-किनारा, सदाएं-आवाज़ें, साइल-भिकारी, रूह-आत्मा, ज़हन-मस्तिष्क, बेहिस सी ज़िद-भावना रहित हठ, …