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Showing posts from November 2, 2018

ख़ुशी के ख़ैर मक़दम में, ग़मों को आज़माने में

ख़ुशी के ख़ैर मक़दम में, ग़मों को आज़माने में बहुत तकलीफ़ होती है हमें अब मुस्कराने में
वफ़ा के कोह से हस्ती में जू-ए-शीर लाने में रहे मसरूफ़ हम अब तक मुक़द्दर आज़माने में
हमें अपने तज़बज़ुब से अगर राहत नहीं होगी गुज़र जाएँगी सदियाँ उस को हाल अपना बताने में
मेरे मालिक, तेरे साइल का है दामन तही अब तक ज़रा बतला तो दे मुझ को, कमी क्या है ख़ज़ाने में
वो लम्हा जिस में सारी ज़िन्दगी की वुसअतें गुम थीं ज़माना लग गया हम को वो इक लम्हा चुराने में
शिकस्त-ओ-फ़तह का ये खेल भी क्या खेल है यारो मज़ा आता है अक्सर जीत कर भी हार जाने में
कहीं आग़ोश-ए-तुरबत में हयात-ए-दायमी भी है कहीं है ज़िन्दगी अटकी नफ़स के ताने बाने में
कभी तो हसरतों के दाम से "मुमताज़" हम छूटें बँटी जाती है हस्ती हसरतों के ख़ाने ख़ाने में