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नज़्म - मुवाज़िना

नज़्म - मुवाज़िना
हसरतों के संग काटो, राह के काँटे चुनो मर्द की दुनिया में जीना किस को कहते हैं, सुनो आहनी पाबंदियों से आरज़ू बुनते हैं हम ज़ुल्म के पत्थर प् लेकिन सर नहीं धुनते हैं हम ग़म के तूफाँ में जले हैं, सब्र की क़ंदील में रास्ता अपना बनाते हैं अना के नील में क़ाबिलीयत को हमारी रास्ता मिलता नहीं ये गराँ संग-ए-त'अस्सुब सब्र से हिलता नहीं हिकमत-ए-अमली हमारी आप को दिखती नहीं साख के बाज़ार में सच्चाई ये बिकती नहीं तोहमतें हम पर हैं लाखों, हम प् सौ दुश्नाम हैं शोहरतें सारी की सारी आप ही के नाम हैं
आहनी– लोहे की,अना– अहं, नील – मिस्र की एक नदी,गराँ – भारी,