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June 14, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - हवा के रक़्स से पानी के साए टूट जाते हैं

हवा के रक़्स से पानी के साए टूट जाते हैं हक़ीक़त की ज़मीं पर गिर के सपने टूट जाते हैं HAWA KE RAQS SE PAANI KE SAAE TOOT JAATE HAIN HAQEEQAT KI ZAMEE.N PE GIR KE SAPNE TOOT JAATE HAIN
बलन्दी रोज़ तो मिलती नहीं फ़नकार के फ़न को कोई शहकार बनता है तो साँचे टूट जाते हैं BALANDI ROZ TO MILTI NAHIN FUNKAAR KE FUN KO KOI SHEHKAAR BANTA HAI TO SAANCHE TOOT JAATE HAIN
तराशा करता है ख़िल्वत में ज़हन-ए-बेकराँ जिनको तसव्वर के वो पैकर गाहे गाहे टूट जाते हैं TARASHA KARTA HAI KHILWAT MEN ZEHN E BEKARAA.N JIN KO TASAWWAR KE WO PAIKAR GAAHE GAAHE TOOT JAATE HAIN
हों कितने भी सुनहरे, ख़्वाब तो फिर ख़्वाब होते हैं कि ज़र्ब-ए-मस्लेहत से सारे वादे टूट जाते हैं HON KITNE BHI SUNEHRE KHWAAB TO PHIR KHWAAB HOTE HAIN KE ZARB E MASLEHAT SE SAARE VAADE TOOT JAATE HAIN
तड़पती है जो वहशत, बेड़ियाँ जब चीख़ उठती हैं दर-ए-ज़िन्दान के फिर सारे क़ब्ज़े टूट जाते हैं TADAPTI HAI JO WAHSHAT BEDIYAA.N JAB CHEEKH UTHTI HAIN DAR E ZINDAAN KE PHIR SAARE QABZE TOOT JAATE HAIN
इरादों के परों पर हसरतें परवाज़ करती हैं जुनूँ जब रक़्स करता है, सितारे टूट जात…