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June 20, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

चमक उट्ठे मेहेर सी हर सतर ये है दुआ यारब

चमक उट्ठे मेहेर सी हर सतर ये है दुआ यारब शुआ बन जाए ये अदना शरर ये है दुआ यारब
लिया है अपने कांधे पर जो ये बार-ए-गरां हम ने ये कार-ए-ख़ैर हो अब कारगर ये है दुआ यारब
हमारी काविशों को वो करामत दे मेरे मौला अमर हो जाए हम सब का हुनर ये है दुआ यारब
हमारा ज़ाहिर-ओ-बातिन हो तेरे नूर से रौशन तू बन कर हुस्न हम सब में उतर ये है दुआ यारब
जज़ा-ए-ख़ैर दे “मुमताज़” बेकल* और नीरज* को दुआओं में मेरी रख दे असर ये है दुआ यारब
बेकल* और नीरज* - बेकल उत्साही और गोपाल दास नीरज, जो इस प्रोजेक्ट में साथ थे।

शाम

वक़्त के ज़र्रों प जब हो मेहर-ए-ताबाँ का ज़वाल शब की तारीकी से हो दिन के उजाले का विसाल करवटें जब ले रहा हो रोज़-ओ-शब का ये निज़ाम नूर का तब खोल कर पर्दा निकाल आती है शाम
अब्र के रुख़ पर गुलाबी रंग फैलाती हुई इक हसीना की तरह लहराती इठलाती हुई चहचहाते पंछियों के रूप में गाती हुई आस्माँ के रुख़ पे अपनी जुल्फ़ बिखराती हुई
मेहर की किरनों की अफ़शाँ जुल्फ़ में चुनती हुई बादलों से फिर उफ़क़ पर लाल रंग बुनती हुई मुस्कराती है, लजाती है, जलाती है दिये फिर सियाही से सजा देती है दिन के ज़ाविए रंग पहले भरती है क़ुदरत की तसवीरों में शाम रफ़्ता रफ़्ता घेर लेती हैं सभी दीवार-ओ-बाम
चंद लम्हों में उतरने लगती है फिर रात में ग़र्क़ हो जाती है आख़िर दरिया-ए-ज़ुल्मात में हो हसीं वो लाख, वो कितनी भी गुलअंदाम हो हर सुनहरी शाम का लेकिन यही अंजाम हो
हुस्न की रंगीनियों पर भी फ़ना आती ही है कोई भी शय हो, कि वो अंजाम को पाती ही है
मेहर-ए-ताबाँ-चमकता हुआ सूरज, ज़वाल-पतन, विसाल-मिलन, रोज़-ओ-शब-रात और दिन, निज़ाम-व्यवस्था, अब्र-बादल, मेहर-सूरज, अफ़शाँ-glitterdust, उफ़क़-क्षितिज, ज़ाविए-दिशाएँ, बाम-छत, ग़र्क़-डूबना, ज़ुल्मात-अंधेरे, गुलअंदाम-फूल क…

सदा मसरूर रहते हैं मोहब्बत के ये दीवाने

सदा मसरूर रहते हैं मोहब्बत के ये दीवाने इसी जज़्बे में खुलते हैं न जाने कितने मैख़ाने
मुझे ईमान का दावा अगर हो भी तो कैसे हो बना रक्खे हैं दिल में भी मोहब्बत ने जो बुतख़ाने
अभी माज़ी के ख़्वाबों को ज़रा ख़ामोश रहने दो अभी तो क़ैद कर रक्खा है हम को फ़िक्र-ए-फ़र्दा ने
न जाने मोड़ कैसा आ गया है दिल की राहों में सभी चेहरे परेशाँ हैं, सभी रस्ते हैं अंजाने
हज़ारों अजनबी साए लिपट कर रो पड़े हम से हम आए थे यहाँ दो चार पल को राहतें पाने
ज़माने के तक़ाज़ों ने तराशा है मुझे कैसे कि आईना भी मेरा अब मेरी सूरत न पहचाने
मेरी बेगानगी ने इस को भी तड़पा दिया आख़िर तमन्ना कब से बैठी रो रही है मेरे सिरहाने
कोई जज़्बा न ग़म, बस बेहिसी ही बेहिसी है अब हमें कैसी जगह पहुँचा दिया ज़ख़्मी तमन्ना ने
क़फ़स में छटपटाता है जुनूँ परवाज़ की ख़ातिर तसव्वर बुन रहा है कितने ही बेबाक अफ़साने  
जुनूँ के वास्ते “मुमताज़” हर महफ़िल में ख़िल्वत है जहाँ दिल है, वहीं हम हैं, वहीं लाखों हैं वीराने