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ग़ज़ल - ये बाब-ए-राज़-ए-उल्फ़त है

ये बाब-ए-राज़-ए-उल्फ़त है, ये खुलवाया नहीं जाता
मोअम्मा अब किसी सूरत ये सुलझाया नहीं जाता
YE BAAB E RAAZ E ULFAT HAI YE KHULWAAYA NAHIN JAATA
MOAMMA AB KISI SOORAT YE SULJHAYA NAHIN JAATA

मोहब्बत की नहीं जाती मोहब्बत हो ही जाती है
कि दानिस्ता तो ये धोखा कभी खाया नहीं जाता
MOHABBAT KI NAHIN JAATI MOHABBAT HO HI JAATI HAI
KE DAANISTA TO YE DHOKA KABHI KHAYA NAHIN JAATA

न जाने कैसी उलझन में हमें उलझा दिया उसने
करें क्या, ये भी अब उससे तो फ़रमाया नहीं जाता
NA JAANE KAISI ULJHAN MEN HAMEN ULJHA DIYA US NE
KAREN KYA YE BHI AB US SE TO FARMAAYA NAHIN JATA

मुसीबत, यास, रंज-ओ-ग़म, अताएँ बेबहा उसकी
ये उसका बेकरां एहसाँ तो गिनवाया नहीं जाता
ALAM RANJ O MUSEEBAT GHAM ATAAEN BEBAHA US KI
KE AB YE BEKARAAN EHSAAN TO GINWAAYA NAHIN JAATA

ये उसपे मुनहसिर है अब, समझ ले, गर समझ पाए
अब अपना हाल-ए-दिल हम से तो बतलाया नहीं जाता
YE US PE MUNHASIR HAI AB SAMAJH LE GAR SAMAJH PAAE
AB APNA HAAL E DIL HAM SE TO BATLAAYA NAHIN JAATA

ये दर्द-ओ-यास की दौलत हर इक दिल को नहीं मिलती
हर इक बतन-ए-सदफ़ में तो गोहर पाया नही…