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ग़ज़ल - फूट कर वो भी तो रोया होगा

फूट कर वो भी तो रोया होगा ख़ून-ए-दिल रंग तो लाया होगा PHOOT  KAR  WO  BHI  TO  ROYA   HOGA KHOON  E  DIL  RANG  TO LAAYA  HOGA
कर लिया तर्क-ए-तअल्लुक़ लेकिन क्या मगर चैन से सोया होगा KAR LIYA TARK-E-TA’ALLUQ LEKIN KYA  MAGAR  CHAIN  SE  SOYA     HOGA
ख़ुद सिमट कर कहीं अपने अंदर उसने बरसों तुम्हें सोचा होगा KHUD SIMAT KAR KAHIN APNE  ANDAR "US NE BARSON TUMHEN SOCHA HOGA”
मेरी वहशत का उसकी चाहत का एक अंजान सा रिश्ता होगा MERI WAHSHAT KA US KI CHAAHAT KA EK   ANJAAN   SA   RISHATAA        HOGA
आग में हम ही नहीं झुलसे हैं उसकी आँखों में भी दरिया होगा   AAG MEN  HAM HI  NAHIN JHULSE HAIN US KI AANKHON MEN BHI DARIYA HOGA
मेरी आँखों में उतर कर उसने इक हसीं ख़्वाब तो देखा होगा MERI AANKHON MEN UTAR KAR US NE WO HASEEN KHAAB TO DEKHA   HOGA
ज़ख़्म तपका तो हुआ है एहसास उसका दिल ज़ोर से तड़पा होगा ZAKHM  JAB  TAPKA  TO  EHSAAS  HUA US  KA  DIL  ZOR  SE  TADPA         HOGA
दे के “मुमताज़” को ग़म का तोहफ़ा रात भर वो भी न सोया होगा DE  KE 'MUMTAZ' KO GHAM KA TOHFA
RAAT  BHAR  WO BHI    NA SOYA HOGA