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Showing posts from July, 2018

ज़र्ब तक़दीर ने वो दी कि मेरी हार के साथ

ज़र्ब तक़दीर ने वो दी कि मेरी हार के साथ रेज़ा रेज़ा हुई तौक़ीर भी पिनदार के साथ
जैसे गुल कोई हम आग़ोश रहे ख़ार के साथ सैकड़ों रोग लगे हैं दिल-ए-बेज़ार के साथ
छू गई थी अभी हौले से नसीम-ए-सहरी ज़ुल्फ़ अठखेलियाँ करने लगी रुख़सार के साथ
रास्ता लिपटा रहा पाँव से नागन की तरह हम भी बस चलते रहे इस रह-ए-ख़मदार के साथ
रूह ज़ख़्मी हुई, लेकिन ये तमाशा भी हुआ हो गई कुंद वो शमशीर भी इस वार के साथ
दीन भी बिकता है बाज़ार-ए-सियासत में कि अब अहल-ए-ईमाँ भी नज़र आते हैं कुफ़्फ़ार के साथ
हक़ पे तू है तो मेरी आँखों से आँखें भी मिला क्यूँ नदामत सी घुली है तेरे इंकार के साथ
है नवाज़िश कि बुलाया मुझे "मुमताज़" यहाँ लीजिये हाज़िर-ए-ख़िदमत हूँ मैं अशआर के साथ

जो दिल को क़ैद किये है हिसार, किस का है

जोदिलकोक़ैदकियेहैहिसार,किसकाहै शऊर-ए-दीदपेआख़िरग़ुबारकिसकाहै
करेंगेहमभीतनासुबतोसब्रकालेकिन येतुमभीसोचलोपरवरदिगारकिसकाहै
येज़ख़्मज़ख़्म

परेशाँ करती थी तूफ़ाँ की दिल्लगी हर वक़्त

परेशाँकरतीथीतूफ़ाँकीदिल्लगीहरवक़्त मगरयेकाग़ज़ीकश्तीभीक्यालड़ी, हरवक़्त
हमाराज़ौक़भीबदज़न ज़राज़रासारहे तमन्नाभीरहेहमसेतनीतनीहरवक़्त
क़रीबआ