संदेश

November 21, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - ये बोझ ज़हन पे रक्खा है मसअले की तरह

ये बोझ ज़हन पे रक्खा है मसअले की तरह ज़मीर जागता रहता है आईने की तरह
YE BOJH ZEHN PE RAKHA HAI MAS'ALE KI TARAH ZAMEER JAAGTA REHTA HAI AAINE KI TARAH
था लेन देन का सौदा, हज़ार शर्तें थीं किया था इश्क़ भी हमने मुआहिदे की तरह THA LEN DEN KA SAUDA, HAZAAR SHARTE'N THI'N KIYA THA ISHQ BHI HAM NE MUAAHIDE KI TARAH
बहुत सुकून में वहशत सी होने लगती है हमें तो दर्द-ओ-अलम भी है मशग़ले की तरह BAHOT SUKOON ME'N WEHSHAT SI HONE LAGTI HAI HAME'N TO DARD O ALAM BHI HAI MASHGHALE KI TARAH
ज़रा जो वक़्त मिला तो इधर भी देख लिया तेरी हयात में हम थे, प हाशिये की तरह ZARA JO WAQT MILA TO IDHAR BHI DEKH LIYA TERI HAYAAT ME'N HAM THE, PA HAASHIYE KI TARAH
करे सलाम भी एहसान की तरह अक्सर हमारा हाल भी पूछे तो वो गिले की तरह KARE SALAM BHI EHSAAN KI TARAH AKSAR HAMARA HAAL BHI POOCHHE TO WO GILE KI TARAH
हमेशा लड़ते रहे वक़्त के थपेड़ों से हयात सारी की सारी थी ज़लज़ले की तरह HAMESHA LADTE RAHE WAQT KE THAPEDO'N SE HAYAAT SAARI KI SAARI THI ZALZALE KI TARAH
ज़रा कुछ अपनी सुनाता, ज़रा मेरी सुनता कभी तो राब्त…