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Showing posts from July 9, 2018

कहाँ तक न जाने मैं आ गई गुम रात दिन के शुमार में

कहाँ तक न जाने मैं आ गई गुम रात दिन के शुमार में कहीं क़ाफ़िला भी वो खो गया इन्हीं गर्दिशों के ग़ुबार में
न कोई रफ़ीक़ न आशना, न अदू न कोई रक़ीब है मैं हूँ कब से तन्हा खड़ी हुई इस अना के तंग हिसार में
है अजीब फ़ितरत-ए-बेकराँ कि सुकूँ का कोई नहीं निशाँ कभी शादमाँ हूँ गिरफ़्त में कभी मुंतशिर हूँ फ़रार में
वो शब-ए-सियाह गुज़र गई मेरी ज़िन्दगी तो ठहर गई है अजीब सी कोई बेकली कोई कश्मकश है क़रार में
जले पर भी वक़्त की धूप में गिरे हम ज़मीं प हज़ारहा वही हौसले हैं उड़ान में, वही लग़्ज़िशें हैं शआर में
जुदा हो गया है वरक़ वरक़ मेरी ज़िन्दगी की किताब का जो ख़ज़ाना दिल में था, खो गया अना परवरी के ख़ुमार में
न वो हिस रही न नज़ाकतें न रहीं क़रार की हाजतें न वो दिल में बाक़ी कसक रही न वो दर्द रूह-ए-फ़िगार में
हर सिम्त खिल गए गुल ही गुल हद्द-ए-निगाह तलक मगर हैं चमन चमन प उदासियाँ हैं ख़िज़ाँ के रंग बहार में
मैं थी गुम सफ़र के जुनून में कि न देखे ख़ार भी राह के दिल-ए-“नाज़ाँ” होता रहा लहू किसी आरज़ू के फ़िशार में


तजज़िया

ऐ मुसलमानो, ज़रा अपना करो कुछ तजज़िया कब तलक हालात का अपने पढ़ोगे मर्सिया कब तलक सोते रहोगे ख़्वाब-ए-ग़फ़लत में जनाब सर प आ पहुँचा है फिर इक बार वक़्त-ए-इंक़िलाब
पाई इतने साल में हम ने फ़क़त इक बेकली ना ख़ुदा ही पाया हम ने ना हमें दुनिया मिली क्या हमारी हैसियत, शतरंज की इक गोट हैं हम सियासी लीडरों के वास्ते बस वोट हैं
बेनवा, बेआसरा, हैवान, सब समझा हमें हुक्मरानों ने भला इंसान कब समझा हमें ये तो सोचो आज तक ग़ैरों ने हम को क्या दिया रहबरी के नाम पर हम को सदा धोका दिया
असबियत, फ़िरक़ापरस्ती, फ़िरक़ावाराना फ़साद चार झूटे लफ़्ज़, कुछ हमदर्दियाँ नाम-ओ-निहाद लूटती आई है हम को इन की ये सेक्यूलरिज़्म दर हक़ीक़त हैं सभी माइल ब फंडामेन्टालिज़्म
मरहले अग़यार के हम को कहाँ पहुँचा गए थे कहाँ और आज हम देखो कहाँ तक आ गए खो गया है दीन अपना, नातवाँ है बंदगी दाने दाने को तरसती है हमारी ज़िन्दगी
आज तक कुछ भी न सोचा क़ौम-ए-मुस्लिम के लिए जब चुनाव आया खिलौने हम को कुछ पकड़ा दिये अनगिनत वादे सुनहरे, अनगिनत चमकीले ख़्वाब पर हक़ीक़त की ज़मीं पर हम ने बस पाया सराब
कुछ तो सोचो, अपनी ग़ैरत को ज़रा आवाज़ दो अपनी हस्ती को ज़रा समझो, ज़रा ऐज़ाज़ दो हम को …