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March 31, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जो है जज़्बात में मौजों सी तुग़यानी, नहीं जाती

जो है जज़्बात में मौजों सी तुग़यानी, नहीं जाती किसी सूरत हमारी दिल की सुल्तानी नहीं जाती
उसे गुज़रे हुए यूँ तो, ज़माना हो चुका है अब मगर वो बेवफ़ा है, बात ये मानी नहीं जाती
न जाने कौन सी मंजिल पे आ पहुंचा सफ़र अपना जहाँ ख़ुद अपनी भी आवाज़ पहचानी नहीं जाती
तअस्सुब से कोई तामीर मुमकिन ही नहीं साहब मोहब्बत की ये मिट्टी बैर से सानी नहीं जाती
बिगड़ कर रह गया दिल मस्लेहत की ऐश-ओ-इशरत में जहान-ए-रंज-ओ-ग़म की ख़ाक अब छानी नहीं जाती
चलन तो आम है फ़ितनागरी का इस ज़माने में मगर अब तक हमारे दिल की हैरानी नहीं जाती
तिजारत का ज़माना है कि बिक जाता है ईमाँ भी बताओ, किस के घर रिश्वत की बिरयानी नहीं जाती
छुपा लो तुम ही ख़ुद को सैकड़ों पर्दों में ख़ातूनो ज़माने की निगाहों से तो उरियानी नहीं जाती
गुज़र जाने दें तूफाँ को, ज़रा झुक कर, तो बेहतर है ये जिद बेकार की "मुमताज़" अब ठानी नहीं जाती

जज़्बात-भावनाएं, मौजों सी-लहरों सी, तुगियानी-हलचल, तअस्सुब-तरफदारी, अना-अहम्, तिजारत – व्यापार, ख़ातूनो – औरतों,  उरियानी – नंगापन 

वो सितमगर आज हम पर वार ऐसा कर गया

वो सितमगर आज हम पर वार ऐसा कर गया ये सिला था हक़परस्ती का कि अपना सर गया
रूह तो पहले ही उसकी मर चुकी थी दोस्तो एक दिन ये भी हुआ फिर, वो जनाज़ा मर गया
वो लगावट, वो मोहब्बत, वो मनाना, रूठना ऐ सितमगर तेरे हर अंदाज़ से जी भर गया
ताक़त-ओ-जुरअत सरापा, नाज़-ए-शहज़ोरी था जो जाने क्यूँ दिल के धड़कने की सदा से डर गया
एक लग़्ज़िश ने ज़ुबाँ की जाने क्या क्या कर दिया तीर जो छूटा कमाँ से काम अपना कर गया
सर झुकाए आज क्यूँ बैठा है तू ऐ तुंद ख़ू कजकुलाही क्या हुई तेरी, कहाँ तेवर गया
एक उस लम्हे को दे दी हम ने हर हसरत कि फिर ज़िन्दगी से सारी मस्ती, हाथ से साग़र गया
ऐ तमन्ना, तेरे इस एहसान का बस शुक्रिया हर अधूरे ख़्वाब से “मुमताज़” अब जी भर गया

हक़परस्ती - सच्चाई की पूजा, जुरअत – हिम्मत,  सरापा – सर से पाँव तक, नाज़-ए-शहज़ोरी – तानाशाही का गौरव, लग़्ज़िश – लड़खड़ाना, तुंद ख़ू – बद मिज़ाज, कजकुलाही – स्टाइल, साग़र – प्याला (शराब का)

गुज़ारा हो नहीं सकता हमारा कमज़मीरों में

गुज़ारा हो नहीं सकता हमारा कमज़मीरों में यही इक ख़ू ग़लत है हम मोहब्बत के सफ़ीरों में
हुकूमत है हमारी दिल की दुनिया के अमीरों में है दिल सुल्तान लेकिन है नशिस्त अपनी फ़क़ीरों में
लहू बन कर रवाँ वो जिस्म की रग रग में था शायद ख़ुदा ने लिख दिया था उसको हाथों की लकीरों में
कोई दीवाना शायद रो पड़ा है फूट कर यारो क़फ़स की तीलियाँ जलती हैं, हलचल है असीरों में
तमाशा देखता है जो खड़ा गुलशन के जलने का वो फ़ितनासाज़ भी रहता है अपने दस्तगीरों में
अना कोई, न है पिनदार, ग़ैरत है, न ख़ुद्दारी ज़ईफ़ी ये कहाँ से आ गई अपने ज़मीरों में
इरादा क्या है, जाने कश्तियाँ वो क्यूँ बनाता है वो शहज़ादा जो रहता है मेरे दिल के जज़ीरों में
सदा है, चीख़ है, इक दर्द है,“मुमताज़” मातम है लहू की धार है सुर की जगह अबके नफ़ीरों में

ख़ू – आदत, सफ़ीरों में – प्रतिनिधियों में, नशिस्त – बैठक, क़फ़स – पिंजरा, असीरों – क़ैदियों, दस्तगीरों – दिलासा देने वालों, पिनदार – इज़्ज़त, ज़ईफ़ी – कमज़ोरी, नफ़ीरों - बांसुरियों 

नारसा ठहरीं दुआएँ इस दिल-ए-नाकाम की

नारसा ठहरीं दुआएँ इस दिल-ए-नाकाम की डूबती ही जा रही है नब्ज़ तश्नाकाम की
ये तड़प, ये दर्द, ये नाकामियाँ, ये उलझनें कोई भी सूरत नज़र आती नहीं आराम की  
सारे आलम की तबाही एक इस उल्फ़त में है कोई तो आख़िर दवा हो इस ख़याल-ए-ख़ाम की
छीन ली बीनाई मेरी एक इस ज़िद ने कि फिर देखा कुछ हमने न कुछ परवाह की अंजाम की
कोशिशें नाकाम सारी, हर तमन्ना तश्नालब हम पे पैहम है इनायत गर्दिश-ए-अय्याम की
हैफ़, क़िस्मत के इरादे किस क़दर बरबादकुन इसने हर तदबीर मेरी आज तक नाकाम की
एक अदना सी तमन्ना, इक मोहब्बत का सफ़र ज़िन्दगी की ये मुसाफ़त थी फ़क़त दो गाम की
थम गई “मुमताज़” वो धड़कन तो हस्ती चुक गई एक धड़कन वो जो थी जानम तुम्हारे नाम की

तश्नाकाम – प्यासा, ख़याल-ए-ख़ाम – झूठा ख़याल, पैहम – लगातार, अय्याम – दिन, हैफ़ – आश्चर्य है