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November 3, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - ज़ख़्म कुरेदा करते हैं हम भी कितने पागल हैं

ज़ख़्म कुरेदा करते हैं हम भी कितने पागल हैं ग़म को ज़िंदा रखते हैं हम भी कितने पागल हैं
ZAKHM KUREDA KARTE HAIN HAM BHI KITNE PAAGAL HAIN GHAM KO ZINDA RAKHTE HAIN HAM BHI KITNE PAAGAL HAIN
दिल के हर इक गोशे को रौशन यूँ कर रक्खा है सायों से भी डरते हैं हम भी कितने पागल हैं DIL KE HAR IK GOSHE KO ROSHAN YUN KAR RAKHA HAI SAAYON SE AB DARTE HAIN HAM BHI KITNE PAAGAL HAIN 
जाने वाले लम्हों को अब भी ढूँढा करते हैं उम्मीदों पर जीते हैं हम भी कितने पागल हैं JAANE WAALE LAMHON KO AB BHI DHOONDA KARTE HAIN UMMEEDON PAR JEETE HAIN HAM BHI KITNE PAAGAL HAIN
दिल की आह-ओ-ज़ारी को दफ़ना कर ख़ुद हँसते हैं सच से भागा करते हैं हम भी कितने पागल हैं DIL KI AAH O ZAARI KO DAFNAA KAR KHUD HANSTE HAIN SACH SE BHAAGA KARTE HAIN HAM BHI  PAAGAL HAIN
हाल की चादर पर फैली बर्फ़ से खेला करते हैं अंदर अंदर जलते हैं हम भी कितने पागल हैं HAAL KI CHAADAR PAR PHAILI BARF SE KHELA KARTE HAIN ANDAR ANDAR JALTE HAIN HAM BHI KITNE PAAGAL HAIN
एक सुनहरा ख़्वाब था जो जाने कब का टूट गया अब भी उस पर मरते हैं हम भी कितने पागल हैं EK SUNEHRA KHWAAB …