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Showing posts from May 12, 2019

क्या मिला तश्नालबी से, आजिज़ी से क्या मिला

क्या मिला तश्नालबी से, आजिज़ी से क्या मिला औरतों को ख़ल्क़ की इस महवरी से क्या मिला کیا ملا تشنہ لبی سے عاجزی سے کیا ملا عورتوں کو خلق کی اس مہوری سے کیا ملا
हुस्न-ए-लामहदूद की इक बेनियाज़ी के सिवा आशिक़ी से क्या मिला है, बन्दगी से क्या मिला حسنِ لامحدود کی اک بےنیازی کے سوا عاشقی سے کیا ملا ہے، بندگی سے کیا ملا
कोई क्यूँ सुनता हमारी बेज़ुबानी की सदा इक घुटन है, और हम को ख़ामुशी से क्या मिला کوئی کیوں سنتا ہماری بےزبانی کی صدا اک گھٹن ہے، اور ہم کو خامشی سے کیا ملا
झूठ, ख़ूँरेज़ी, तमाशा, तल्ख़ियाँ, बदकारियाँ क्या कहें, इंसानियत को इस सदी से क्या मिला جھوٹ، خوں ریزی، تماشہ، تلخیاں، بدکاریاں کیا کہیں، انسانیت کو اس صدی سے کیا ملا
लूट कर सारा ख़ज़ाना इस को बंजर कर दिया इस ज़मीं को देख लीजे, आदमी से क्या मिला لوٹ کر سارا خزانہ اس کو بنجر کر دیا اس زمیں کو دیکھ لیجے آدمی سے کیا ملا
रेगज़ारों से लिपटते आबले सुलगा किए ज़िन्दगी, तुझ को तेरी आवारगी से क्या मिला ریگزاروں سے لپٹتے آبلے سلگا کئے زندگی، تجھ کو تری آوارگی سے کیا ملا
दम ब दम हर एक टुकड़ा करता है अब ये सवाल दिल, बता, तुझ को वफ़ा की हमरही से क्या मिला دم بہ دم ہر ایک ٹکڑا کرتا…