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Showing posts from December 22, 2018

फ़र्ज़ है, पास-ए-मोहब्बत है, वफ़ा है, शायद

फ़र्ज़ है, पास-ए-मोहब्बत है, वफ़ा है, शायद इस अज़ीयत1 में तो कुछ और मज़ा है शायद
दिल तो कहता है कि मेरी ही ख़ता है, शायद ज़हन कहता है कि ये खेल बड़ा है शायद
पा2-ए-क़िस्मत पे जो ग़श3 खा के गिरा है कोई ज़िन्दगी भर के सफ़र से वो थका है शायद
जहाँ क़दमों के निशाँ हैं, वहाँ भीगी है ज़मीं दश्त-ए-सेहरा4 में कोई आबला5 पा है शायद
धज्जियाँ जिस की फ़ज़ाओं में उडी जाती हैं झूट के तन पे ये रिश्तों की क़बा6 है शायद
ज़र्ब7 देता है, मिटाता है, सितम ढाता है मेरे क़ातिल को मेरा राज़ पता है शायद
खाए जाती है मेरी रूह8 की सैराबी9 को ये शब-ए-तार10 तो मूसा का असा11 है शायद
रोज़ देता है सबक़ मुझ को नए हस्ती के मुझ में जो बोल रहा है, वो ख़ुदा है शायद <