नज़्म - न जाने कौन है


न जाने कौन है वो अजनबी
वो हमनवा मेरा

न जाने कब से इक एहसास बन कर आ गया है वो
खयाल-ओ-ख़्वाब पर, जह्न-ओ-तबअ पर छा गया है वो
कभी सरगोशियों में धड़कनों की लय सुनाता है
कभी चुपके से इक उल्फ़त का नग़्मा गुनगुनाता है

ख़ुमारी झाँकती रहती है बहकी बहकी साँसों से
कभी साँसें महक उठती हैं उसकी महकी साँसों से
कभी उसके लबों का लम्स छू लेता है गालों को
चुना करती हैं आँखें उसकी नज़रों के उजालों को

न जाने कौन है, किस की इबादत करती रहती हूँ
किसी एहसास के पैकर से उल्फ़त करती रहती हूँ
मेरे जज़्बे की धड़कन है, मेरी उल्फ़त का दिल है वो
तसव्वर है, तख़य्युल है, सराब-ए-मुस्तक़िल है वो

न जाने कौन है
वो अजनबी
वो हमनवा मेरा

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