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Showing posts from July 8, 2018

न सेहरा में भटके, न सागर खंगाले

न सेहरा में भटके, न सागर खंगाले कहाँ तक कोई आरज़ू को संभाले
बड़ी देर से मुंतज़िर हैं उम्मीदें मुक़द्दर तमन्ना को वादों पे टाले
अभी मसलेहत की सदा रायगाँ है अभी तो ख़िरद है जुनूँ के हवाले
जुनूँ से कहो, तोल ले अपनी हस्ती इरादे से कह दो कि पर आज़मा ले
तख़य्युल पे है तीरा बख़्ती का पहरा ज़ुबाँ पर लगे हैं ख़मोशी के ताले
अब इस के लिए उस को तकलीफ़ क्या दें चलो ख़ुद ही हम फोड़ लें दिल के छाले
निसार इस जुनूँ के कि दीवानगी में मुक़द्दर के हम ने कई बल निकाले
तुम्हें नुक्ताचीनो दिखाएंगे हम भी ज़फ़र याब होंगे सई करने वाले
फिराए ख़िरद को न जाने कहाँ तक तसव्वर के “मुमताज़” हैं ढब निराले

नूर ये किस का रोज़ चुरा कर लाए ये मेहर-ए-ताबाँ

नूर ये किस का रोज़ चुरा कर लाए ये मेहर-ए-ताबाँ रोज़ समंदर की मौजों पर कौन बिखेरे अफ़शाँ
टूट गए सब प्यार के टाँके ज़ख़्म हुआ है उरियाँ तेज़ हुई लय दर्द की यारो हार गया हर दरमाँ
इश्क़ की बाज़ी, जान का सौदा, दाग़, सितम, रुसवाई चार क़दम दुश्वार है चलना, राह नहीं ये आसाँ
जितनी बढ़ी सैलाब की शिद्दत उतना जुनूँ भी मचला नाव शिकस्ता पार हुई, हैरान खड़ा है तूफ़ाँ
ख़ास हुई इख़लास की ज़ौ फिरती है वफ़ा आवारा इश्क़ भी है इफ़रात में हासिल, और हैं दिल भी अर्ज़ाँ
जीत गया तू हार के भी हर दाँव शिकस्त-ए-दिल का हार गए हम जीत के भी पिनदार की बाज़ी जानाँ
आज हुआ “मुमताज़” मुकम्मल इश्क़ का वो अफ़साना टूट गई ज़ंजीर वफ़ा की तंग हुई जब जौलाँ