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Showing posts from June 28, 2018

ख़िताब

ऐ मुसलमानो, है तुम से दस्त बस्ता ये ख़िताब दिल पे रख कर हाथ सोचो, फिर मुझे देना जवाब उम्मत ए मुस्लिम की हालत क्यूँ हुई इतनी ख़राब किस लिए अल्लाह ने डाला है हम पर ये अज़ाब
कह रहे हैं लोग, बदतर है हमारी ज़िन्दगी पिछड़ी क़ौमों से भी, बदबख़्तों से भी, दलितों से भी सुन के ये सब मन्तक़ें, इक बात ये दिल में उठी हम में ये बे चेहरगी आख़िर कहाँ से आ गई
हम दलीतों से भी नीचे? अल्लाह अल्लाह, ख़ैर हो हाय ये हालत, कि हम से किबरिया का बैर हो? तुम वतन में रह के भी अपने वतन से ग़ैर हो अब क़दम कोई, कि अपनी भी तबीअत सैर हो
कुछ तो सोचो, ज़हन पे अपने भी कुछ तो ज़ोर दो ग़ैर के हाथों में आख़िर क्यूँ तुम अपनी डोर दो अपनी इस तीर शबी को फिर सुनहरी भोर दो फिर उठो इक बार ऐसे, वक़्त को झकझोर दो
ये ज़रा सोचो, कि तुम अपनी जड़ों से क्यूँ कटे मसलकों में क्यूँ जुदा हो, क्यूँ हो फ़िर्क़ों में बँटे अब तअस्सुब को समेटो, कुछ तो ये दूरी पटे यक जहत हो जाएं जो हम, तो ये तारीकी हटे
हम फ़रेब ए मसलेहत हर बार खाते आए हैं मुल्क के ये रहनुमा हम को नचाते आए हैं कितने अंदेशों से ये हम को डराते आए हैं ये हमारी लाश पर महफ़िल सजाते आए हैं
क़ौम के वो रहनुमा,

कोई हिकमत न चली, कोई भी दरमाँ न चला

कोई हिकमत न चली, कोई भी दरमाँ न चला पुर नहीं होता किसी तौर मेरे दिल का ख़ला
तो तमन्नाओं की क़ुरबानी भी काम आ ही गई सुर्ख़रू हो के चलो आज का सूरज भी ढला
मुंतज़िर घड़ियों की राहें जो हुईं लामहदूद लम्हा लम्हा था तवील इतना कि टाले न टला
आज भी हम ने तुझे याद किया है जानम दिल के ज़ख़्मों प नमक आज भी जी भर के मला
अब हुकूमत में अना की तो यही होना था दिल को बहलाया बहुत, ख़ूब तमन्ना को छला
तश्नगी का ये सफ़र और कहाँ ले जाता मुझ को ले आया सराबों में मेरा कर्ब-ओ-बला
जब से बाज़ार प जज़्बात ने डाली है गिरफ़्त फिर ज़माने में मोहब्बत का ये सिक्का न चला
दिन को “मुमताज़” ख़यालात मुज़िर थे लेकिन रात ख़ामोश हुई जब तो मेरा ज़ेहन जला
दरमाँ – इलाज, पुर – भरा हुआ, ख़ला – शून्य, मुंतज़िर – इंतज़ार करने वाले, लामहदूद – जिस की हद न हो, तवील – लंबा, अना – अहं, तश्नगी – प्यास, सराबों में – मृगतृष्णाओं में, कर्ब-ओ-बला – दर्द और मुसीबत, मुज़िर – नुक़सानदेह

रक्खे हों जैसे दिल प शरारे, कुछ इस तरह

रक्खे हों जैसे दिल प शरारे, कुछ इस तरह दिन ज़िन्दगी के हम ने गुज़ारे कुछ इस तरह
सहरा की वुसअतों में हो जैसे सराब सा करती रही हयात इशारे कुछ इस तरह
हम से बिछड़ के जैसे बड़ी मुश्किलों में हो माज़ी तड़प के हम को पुकारे कुछ इस तरह
तूफ़ाँ से जंग जैसे कि उस का ही जुर्म था कश्ती प हँस रहे थे किनारे कुछ इस तरह
हर ज़ाविए से लगती है अब कितनी ख़ूबरु हम ने क़ज़ा के रंग निखारे कुछ इस तरह
हस्ती है तार तार, तमन्ना लहू लहू हम ज़िन्दगी की जंग में हारे कुछ इस तरह
मिज़गाँ से जैसे टूट के आँसू टपक पड़े टूटे फ़लक से आज सितारे कुछ इस तरह
हसरत, उम्मीद, ख़्वाब, वफ़ा, कुछ न बच सका बिखरे मेरे वजूद के पारे कुछ इस तरह
“मुमताज़” जल के ख़ाक हुई सारी ज़िन्दगी सुलगे थे आरज़ू के शरारे कुछ इस तरह
मिज़गाँ – पलक

नाइन-इलेवन

पल वो नौ ग्यारह के, वो मजबूरियों का सिलसिला वो क़यामत खेज़ मंज़र, हादसा दर हादसा मौत ने लब्बैक उस दिन कितनी जानों पर कहा कौन कर सकता है आख़िर उन पलों का तजज़िया
हादसा कहते हैं किस शै को, बला क्या चीज़ है डूबना सैलाब ए आतिश में भला क्या चीज़ है मौत से आँखें मिलाने की भला हिम्मत है क्या जिन पे गुजरी थी, ये पूछो उन से, ये दहशत है क्या
पूछना है गर तो पूछो बूढ़ी माओं से ज़रा जिन के लख्त ए दिल को उन मुर्दा पलों ने खा लिया उन यतीमों से करो दरियाफ़्त, ग़म होता है क्या लम्हों में रहमत का साया जिन के सर से उठ गया
है क़ज़ा का ज़ुल्म क्या, बेवाओं को मालूम है अश्क के क़तरों में पिन्हाँ कौन सा मफ़हूम है क्या बताएं, किस क़दर बदबख्त ये मरहूम हैं जो कफ़न क्या, लाश के रेजों से भी महरूम हैं
हैं कई ऐसे भी, जिन की ज़िन्दगी की राह में सिर्फ़ आँसू, सिर्फ़ आहें, सिर्फ़ नाले रह गए जिन की तन्हा रूह के जलते सहीफ़े में तो अब बाब ए हसरत के सभी औराक़ काले रह गए
जिस जगह टूटी बला ए नागहाँ अफ़लाक से उस ज़मीं के ज़ख्म अश्कों से सभी धोते रहे उस सिफ़र मैदान में फ़सलें तड़प की हैं उगी ज़र्रे ज़र्