बुधवार, 27 जून 2018

ग्राउंड ज़ीरो


सुबह की पेशानी पर चुनता था अफ़शाँ आफ़ताब
कारगाह-ए-यौम-ए-नौ का खुल चुका था पहला बाब
जाग उठी थी, लेती थी अंगड़ाइयाँ सुबह-ए-ख़िराम 
अपने अपने काम पर सब चल दिये थे ख़ास-ओ-आम
अपनी अपनी फ़िक्र-ओ-फ़न में हौसले महलूल थे
बूढ़े-बच्चे, मर्द-ओ-ज़न सब काम में मशग़ूल थे
बस किसी भी आम से दिन की तरह ये दिन भी था
किस को था मालूम, होगा आज इक महशर बपा

एक तय्यारा हवा में झूमता उड़ता हुआ
इक फ़लक आग़ोश इमारत से लो वो टकरा गया
इस धमाके से इमारत की इमारत काँप उठी
एक पल को आलम-ए-इन्साँ की ग़ैरत काँप उठी
यूँ वहाँ बरपा हुआ इक आग का सैलाब सा
जैसे नाज़िल हो गई हो आस्माँ से इक बला
हर कोई सकते में था, सब के ख़ता औसान थे
नागहानी इस बला से मर्द-ओ-ज़न हैरान थे

चार सू बरपा हुआ इक शोर, दहशत छा गई
यूँ हुआ रक़्स-ए-क़ज़ा, हर जान लब पर आ गई
रेज़े इंसानी बदन के चार सू बिखरे हुए
हो गए मिस्मार हर इक ज़िन्दगी के ज़ाविए
हर तरफ़ बादल धुएँ के, आग की दीवार सी
खा गई कितनी ही जानों को ये दहशत मार सी
जिस को जो रस्ता मिला, उस सिम्त भागा हर बशर
कोई तो खिड़की से कूदा, कोई पहुंचा बाम पर
इतनी कोशिश से भी आख़िर जान बच पाई कहाँ
हर तरफ़ फैला हुआ था मौत का काला धुआँ
छत प जाने वाले सब आख़िर धुएँ में खो गए
खिड़कियों से कूदने वालों के टुकड़े हो गए

वो बला-ए-आतिशीं अपना हुनर दिखला गई
देखते ही देखते पिघली इमारत आहनी
रेत की मानिंद ऐसा बिखरा वो शहकार था
कुछ ही घड़ियों में वहाँ मलबे का बस अंबार था  

पेशानी माथा, अफ़शाँ ग्लिटर डस्ट, आफ़ताब सूरज, कारगाह-ए-यौम-ए-नौ नई सुबह की वर्क शॉप, बाब दरवाज़ा, महलूल घुला हुआ, ज़न औरत, तय्यारा हवाई जहाज़, फ़लक आग़ोश गगन चुम्बी, ख़ता औसान थे होश उड़े हुए थे,  नागहानी अचानक, चार सू चारों तरफ़, रक़्स-ए-क़ज़ा मौत का नाच, रेज़े टुकड़े, मिस्मार ध्वस्त, ज़ाविए फलक, मार साँप, बाम छत।

चेहरा पढ़ लो, लहजा देखो


चेहरा पढ़ लो, लहजा देखो
दिल की बातें यूँ भी समझो

फिर खोलो यादों की परतें
दिल के सारे ज़ख़्म कुरेदो

अब कुछ दिन जीने दो मुझ को
ऐ दिल की बेजान ख़राशो

रंजिश की लौ माँद हुई है
फिर कोई इल्ज़ाम तराशो

सुलगा दो हस्ती का जंगल
जलते हुए बेचैन उजालो

दर्द तुम्हारा भी देखूँगी
दम तो लो ऐ पाँव के छालो

ख़त्म हुई हर एक बलन्दी
ऐ मेरी बेबाक उड़ानो

तंग दिलों की इस बस्ती में
उल्फ़त की ख़ैरात न माँगो

मग़रूरीयत के पैकर पर
मजबूरी के ज़ख़्म भी देखो

हर्फ़ को सच्चे मानी दे कर
लफ़्ज़ों का एहसान उतारो

थोड़ा तो आराम अता हो
ऐ मेरे मुमताज़ इरादों

दुलहन रात दिवाली की


डाल सियह ज़ुल्फ़ों में अफ़शाँ दुलहन रात दिवाली की
लाई दिलों में लाखों ख़ुशियाँ रौशन रात दिवाली की

दीपशिखाओं  की  अठखेली,  हँसती  हुई  आतिशबाज़ी
आग  की  लौ  से  खेल  रही  है  बैरन  रात  दिवाली  की

फैला  है  इक  रंग  सुनहरा  आसमान  की  कालिख  पर
तारीकी  ने  नूर  की  ओढ़ी  चिलमन  रात  दिवाली  की

नक़्क़ाशी  से  झाँक  रहा  है  हुनर  हिनाई  हाथों  का
बिखरे  रंग   जाने  कितने  आँगन  रात  दिवाली  की

आँखों  की  गहराई  परेशाँ,  ज़ुल्फ़ों  की  नागन  ख़ामोश
ताश  के  पत्तों  में  उलझे  हैं  साजन  रात  दिवाली  की

छोटे  घर  के  छोटे  लोगों  की  छोटी  सी  ख़ुशियाँ  हैं
रामकली  ले  कर  आई  है  उतरन  रात  दिवाली की

गुड़िया की शादी का ख़र्चा, गुड्डू के कालेज की फ़ीस
छोड़ो यार, हटाओ सारे टेंशन रात दिवाली की

आज की शब कर कोई करिश्मा, ऐ रब, ऐ अल्लाह मेरे
लौटा दे "मुमताज़" हमारा बचपन रात दिवाली की


लेकिन

१.
आबिदा देखा?
वही था न?
वही तो था वो
पास से गुज़रा, मगर ऐसे कि देखा भी नहीं
देखना कैसी सज़ा दूँगी मैं इस को, अब के
आएगा मिलने
तो मैं भी इसे देखूँगी नहीं
देखना तू
कि मैं इस से कभी बोलूंगी नहीं
२.
जाने वो कौन सी उलझन में घिरा होगा कल
जब कि कल राह पे मुझ को भी न देखा उस ने
जाने क्या ग़म है उसे
कैसी कशाकश में है वो
हाय! मर जाऊं
कि मैं ने उसे पूछा भी नहीं
काश
ग़म उस के कलेजे में छुपा लेती मैं
अब वो मिलता तो उसे दिल से लगा लेती मैं
३.
ऐसा लगता है
किसी और का हो बैठा है वो
इसलिए उस ने मुझे राह में देखा भी नहीं
मुझ को मालूम था
ऐसी ही है ये मर्द की ज़ात
कैसे हँस हँस के पड़ोसन से किये जाता था बात
और कहता है, मैं बेवजह का शक करती हूँ?
उस पे इलज़ाम बिला वजह के मैं धरती हूँ
४.
देखना तू
कि मैं उस से न कभी बोलूंगी
लाख समझाए मगर
कुछ न सुनूंगी मैं भी
इक जहाँ उस ने नया अपना बनाया है अगर
सात रंगों के कई ख़्वाब बुनूँगी मैं भी
५.
आज का वादा था
लेकिन नहीं आया अब तक
जाने क्या बात है
क्यूँ उस ने बदल लीं नज़रें
एक ख़त लिक्खूं उसे
और ये पूछूं...
लेकिन....
कोई मिलने कि ही सूरत मैं निकालूँ...
लेकिन....
ता क़यामत मैं रहूँ मुंतज़िर उस की...
लेकिन.....

ता क़यामत-प्रलय तक, मुंतज़िर-प्रतीक्षा में 

ये कैसा दर्द है

ये कैसा दर्द है कैसी कसक है ये क्यूँ हर   पल   तेरी   यादें मुझे बेचैन रखती हैं तेरी आँखें मेरे दिल पर वफ़ा का नाम लिखती हैं ये ...