शनिवार, 5 मई 2018

ज़िन्दगी मेरे लिए हो गई बोहताँ जानाँ



 ज़िन्दगी मेरे लिए हो गई बोहताँ जानाँ
मुझ पे कितना है बड़ा ये तेरा एहसाँ जानाँ

तेरे वादे, तेरी क़समें तेरी उल्फ़त, तेरा दिल
हर हक़ीक़त है मेरे सामने उरियाँ जानाँ

इस कहानी में मेरे ख़ूँ की महक शामिल है
और तेरा नाम है अफ़साने का उनवाँ जानाँ

दिल पे इक अब्र सा छाया था न जाने कब से
आज तो टूट के बरसा है ये बाराँ जानाँ

इक वही बात जो कानों में कही थी तू ने
दिल अभी तक है उसी बात का ख़्वाहाँ जानाँ

अब तो ता दूर कहीं कोई नहीं राह-ए-फ़रार
खोल दे अब तो मेरे पाँव से जौलाँ जानाँ

बाद अज़ इसके बहुत तंग है जीना लेकिन
फ़ैसला तर्क-ए-तअल्लुक़ का है आसाँ जानाँ

पहले दिल ज़ख़्मी था, अब रूह तलक ज़ख़्मी है
तू ने क्या ख़ूब किया है मेरा दरमाँ जानाँ

अब यहाँ आ के जुदा होती हैं राहें अपनी
अब क़राबत का नहीं कोई भी इमकाँ जानाँ

इश्क़ में अब वो जुनूँ है न वफ़ा में वो ग़ुरूर
अब ये शै दुनिया में मुमताज़ है अर्ज़ाँ जानाँ

बोहताँ-झूठा इल्ज़ाम, उरियाँ-नग्न, उनवाँ-शीर्षक, अब्र-बादल, बाराँ-बारिश, ख़्वाहाँ-इच्छुक, राह-ए-फ़रार-भागने का रास्ता, जौलाँ-बेड़ी, तर्क-ए-तअल्लुक़-रिश्ता तोड़ना, दरमाँ-इलाज, क़राबत-नजदीकी, इमकाँ-उम्मीद, अर्ज़ाँ-सस्ती

नज़्म-चाहत



 तुम्हारी आरज़ू में रंग भरना चाहती हूँ मैं
तुम्हें जी भर के जानाँ प्यार करना चाहती हूँ मैं

ये लंबा फ़ासला आख़िर मुझे कैसे गवारा हो
तुम्हारी वहशतों को कुछ मेरे दिल का सहारा हो
समेटूँ अपने दामन में तुम्हारे दिल के सन्नाटे
निगाहों से मैं चुन लूँ सब तुम्हारी राह के काँटे

मेरी हर जुस्तजू तुम से शुरू हो, खत्म तुम पर हो
तुम्ही हो ज़िन्दगी मेरी तुम्ही मेरे मुक़द्दर हो
तुम्हारे काम न आए तो मेरी ज़िन्दगी क्या है
हर इक सजदा मेरा बेकार है ये बंदगी क्या है

ख़ुशी ले लो मेरी मुझ को तुम अपने सारे ग़म दे दो
मुझे इतनी जगह तो अपने दिल में कम से कम दे दो

गीत- इक बार ज़रा


माना कि हमारे बीच में अब वो प्यार का पागलपन न रहा
वो इन्द्रधनुष से दिन न रहे, वो सपनों का सावन न रहा
पर दिल कि अधूरी आस है ये
तुम आ जाओ इक बार ज़रा

वो प्यार नहीं, तक़रार सही
उल्फ़त न सही व्यापार सही
राहत न सही उलझन ही सही
बेचैन सी इक धड़कन ही सही
खुशियाँ न सही आँसू ही सही
दे जाओ कोई ग़म का तोहफ़ा

मेरी सुबहें अंधेरी हैं तुम बिन
मेरा हर इक ख़्वाब अधूरा है
हर एक सवाल सवाली है
हर एक जवाब अधूरा है
हर आस मिटे, विश्वास मिटे
दे जाओ मुझे उल्फ़त की सज़ा

देखो तो हमारी रंजिश पर
अब हँसते हैं दुनिया वाले
उल्फ़त की तबाही पर ताने
अब कसते हैं दुनिया वाले
बदनामी की इस आग को अब
दे जाओ थोड़ी और हवा

ये कैसा दर्द है

ये कैसा दर्द है कैसी कसक है ये क्यूँ हर   पल   तेरी   यादें मुझे बेचैन रखती हैं तेरी आँखें मेरे दिल पर वफ़ा का नाम लिखती हैं ये ...