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ग़ज़ल - तड़प को हमनवा रूह-ओ-बतन को कर्बला कर लो

तड़प को हमनवा रूह-ओ-बतन को कर्बला कर लो ज़रा कुछ देर को माज़ी से भी कुछ सिलसिला कर लो

सियाही जो निगल डाले सरासर रौशनी को भी तो फिर हक़ है कहाँ, बातिल है क्या, ख़ुद फ़ैसला कर लो
इबादत नामुकम्मल है, अधूरा है हर इक सजदा असास-ए-ज़हन-ओ-दिल को भी न जब तक मुब्तिला कर लो
थकन को पाँव की बेड़ी बना लेने से क्या होगा सफ़र आसान हो जाएगा थोड़ा हौसला कर लो
बलन्दी भी झुकेगी हौसले के सामने बेशक जो ख़ू परवाज़ को काविश को अपना मशग़ला कर लो
ज़माने भर से नालाँ हो, शिकायत है ख़ुदा से भी कभी “मुमताज़” अपने आप से भी तो गिला कर लो
تڑپ  کو  ہمنوا  روح  و  بطن  کو  کربلا  کر  لو ذرا  کچھ  دیر  کو  ماضی  سے  بھی  کچھ  سلسلہ  کر  لو
سیاہی  جو  نگل  جاے  سراسر  روشنی  کو  بھی تو  پھر  حق  ہے  کہاں  باطل  ہے  کیا  خود  فیصلہ  کر  لو
عبادت  نامکمّل  ہے , ادھورا  ہے  ہر  اک سجدہ اساس  ذہن  و  دل  کو  بھی  نہ  جب  تک  مبتلا  کر  لو
تھکن  کو  پاؤں  کی  بیڑی  بنا  لینے  سے  کیا  ہوگا سفر  آسان  ہو  جائگا , تھوڑا   حوصلہ  کر  لو
بلندی  بھی  جھکیگی  حوصلے  کے  سامنے  بیشک جو  خو   پرواز  کو , کاوش  کو  اپنا  مشغلہ  کر  لو
زمانے  بھر  سے  نالاں  ہو…

तरही ग़ज़ल - ये शिद्दत तश्नगी की बढ़ रही है अश्क पीने से

ये शिद्दत तश्नगी की बढ़ रही है अश्क पीने से हमें वहशत सी अब होने लगी मर मर के जीने से

बड़ी तल्ख़ी है लेकिन इस में नश्शा भी निराला है
हमें मत रोक साक़ी ज़िन्दगी के जाम पीने से

हर इक हसरत को तोड़े जा रहे हैं रेज़ा रेज़ा हम
उतर जाए ये बार-ए-आरज़ू शायद कि सीने से

अभी तक ये फ़सादों की गवाही देती रहती है
लहू की बू अभी तक आती रहती है खज़ीने से

बिखर जाएगा सोना इस ज़मीं के ज़र्रे ज़र्रे पर
ये मिटटी जगमगा उठ्ठेगी मेहनत के पसीने से

हमारे दिल के शो'लों से पियाला जल उठा शायद
लपट सी उठ रही है आज ये क्यूँ आबगीने से

ये जब बेदार होते हैं, निगल जाते हैं खुशियों को
ख़लिश के अज़दहे लिपटे हैं माज़ी के दफीने से

मचलती मौजों पे हम तो जुनूं को आज़माएंगे
"
जिसे साहिल की हसरत हो, उतर जाए सफ़ीने से"

हमें तो ज़िंदगी ने हर तरह आबाद रक्खा है
तो क्यूँ 'मुमताज़' अब लगने लगा है ख़ौफ जीने से

आबगीने काँच का ग्लास,बेदार जागना,बार बोझ 

ग़ज़ल - जल्वा था कि इक तूर-ए-दरख़्शाँ था अयाँ

जल्वा था कि इक तूर-ए-दरख़्शाँ था अयाँ नज़रों को संभालें ये रहा होश कहाँ
JALWA THA KE IK TOOR E DARAKHSHAA'N THA AYAA'N NAZARO'N KO SAMBHAALE'N YE RAHA HOSH KAHA'N
हसरत न कोई ख़्वाब न अब दर्द-ए-निहाँ बाक़ी न रहा ज़ीस्त का कोई इमकाँ HASRAT NA KOI KHWAAB NA AB DARD E NIHAA'N BAAQI NA ZEEST KA KOI IMAKAA'N
इस राह से गुज़री थी वो ज़ौबार किरन हर नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है अभी तक ताबाँ IS RAAH SE GUZRI THI WO ZOU BAAR KIRAN HAR NAQSH E KAF E PAA HAI ABHI TAK TAABA'N
उल्फ़त का गुज़र दिल के सियहख़ाने से ये ज़ीस्त की राहों में तजल्ली का गुमाँ ULFAT KA GUZAR DIL KE SIYAHKHAANE SE YE ZEEST KI RAAHO'N ME'N TAJALLI KA GUMAA'N
भीगी हुई रहती है सदा दिल की ज़मीं बारिश से धुला करता है हर दाग़ यहाँ BHEEGI HUI REHTI HAI SADAA DIL KI ZAMEE'N BAARISH SE DHULA KARTA HAI HAR DAAGH YAHA'N
ख़ुर्शीद की किरनों ने छुआ बढ़ के ज़रा बिखरी है समंदर की सतह पर अफ़शाँ KHURSHEED KI KIRNO'N NE CHHUAA BADH KE ZARA BIKHRI HAI SAMANDAR KI SATAH PAR AFSHAA'N
माज़ी के दरीचों से जो देखा हम ने हर सिम्त तबाही के नज़र…

तरही ग़ज़ल - कहाँ तक न जाने मैं आ गई

कहाँ तक न जाने मैं आ गई गुम रात दिन के शुमार में कहीं क़ाफ़िला भी वो खो गया इन्हीं गर्दिशों के ग़ुबार में
KAHA'N TAK NA JAANE MAI'N AA GAI, GUM RAAT DIN KE SHUMAAR ME'N
KAHI'N QAAFILAA BHI WO KHO GAYA, INHI'N GARDISHO'N KE GHUBAAR ME'N
न कोई रफ़ीक़, न आशना, न अदू, न कोई रक़ीब है मैं हूँ कब से तन्हा खड़ी हुई इस अना के तंग हिसार में NA KOI RAFEEQ NA AASHNA, NA ADOO NA KOI RAQEEB HAI MAI'N HOO'N KAB SE TANHAA KHADI HUI, IS ANAA KE TANG HISAAR ME'N
है अजीब फ़ितरत-ए-बेकराँ कि सुकूँ का कोई नहीं निशाँ कभी शादमाँ हूँ गिरफ़्त में कभी मुंतशिर हूँ फ़रार में HAI AJEEB FITRAT E BEKARAA'N KE SUKO'N KA KOI NISHAA'N NAHI'N KABHI SHAADNAA'N HOO'N GIRAFT ME'N, KABHI MUNTASHIR HOO'N FARAAR ME'N
वो शब-ए-सियाह गुज़र गई मेरी ज़िन्दगी तो ठहर गई है अजीब सी कोई बेकली कोई कश्मकश है क़रार में WO SHAB E SIYAAH GUZAR GAI, MERI ZINDAGI TO THEHER GAI HAI AJEEB SI KOI BEKALI, KOI KASH MA KASH HAI QARAAR ME'N
खिले गुल ही गुल हैं हर एक सिम्त हद्द-ए-निगाह तलक मग…

तरही ग़ज़ल - फिर बहारों को ख़्वाब देती हूँ

लग़्ज़िशों को शबाब देती हूँ फिर बहारों को ख़्वाब देती हूँ
LAGHZISHO'N KO SHABAAB DETI HOO'N PHIR BAHAARO'N KO KHWAAB DETI HOO'N
ख़ुद को यूँ भी अज़ाब देती हूँ आरज़ू का सराब देती हूँ KHUD KO YU'N BHI AZAAB DETI HOO'N AARZOO KA SARAAB DETI HOO'N
वक़्त-ए-रफ़्ता के हाथ में अक्सर ज़िन्दगी की किताब देती हूँ WAQT E RAFTA KE HAATH ME'N AKSAR ZINDAGI KI KITAAB DETI HOO'N
सी के लब ख़ामुशी के धागों से हसरतों को अज़ाब देती हूँ SEE KE LAB KHAAMUSHI KI DHAAGO'N SE HASRATO'N KO AZAAB DETI HOO'N
जी रही हूँ बस एक लम्हे में इक सदी का हिसाब देती हूँ JEE RAHI HOO'N BAS EK LAMHE ME'N IK SADI KA HISAAB DETI HOO'N
ज़ुल्म सह कर भी मुतमइन हूँ मैं ज़िन्दगी को जवाब देती हूँ ZULM SEH KAR BHI MUTMAIN HOO'N MAI'N ZINDAGI KO JAWAAB DETI HOO'N
बाल-ओ-पर की हर एक फड़कन को हौसला? जी जनाब, देती हूँ BAAL O PAR KI HAR EK PHADKAN KO HAUSLA? JEE JANAAB, DETI HOO'N
यादगार-ए-शिकस्त-ए-दिल भी तो हो “आज तुम को गुलाब देती हूँ” YAADGAAR E SHIKAST E DIL BHI TO HO " AAJ TUM KO GULAA…

ग़ज़ल - हर हरकत में लाखों तूफ़ाँ, हर जुम्बिश में इक हंगाम

हर हरकत में लाखों तूफ़ाँ, हर जुम्बिश में इक हंगाम मेरे इस बेख़ौफ़ जुनूँ का जाने क्या होगा अंजाम har harkat meN laakhoN toofaaN har jumbish meN ik hangaam mere is bekhauf junooN ka jaane kya hoga anjaam
दरियादिली का इस दुनिया में मिलता है ये ही इनआम आग लगा दी छाँव को इस ने, धूप के सर पर है इल्ज़ाम dariya dili ka is aalam meN milta hai ye hi in'aam aag laga di chaanv ko is ne dhoop ke sar pe hai ilzaam
दिल में ख़ज़ाने, आँख में मोती, लेकिन दामन फिर भी तही बस इतनी क़िस्मत है अपनी, ख़ाली मीना, ख़ाली जाम dil meN khazaane aankh men moti, lekin daaman phir bhi tahee bas itni qismat hai apni, khaali meena, khaali jaam
कुछ अपनी रफ़्तार बढ़ाओ, जोश को कुछ तुग़ियानी दो मंज़िल कितनी दूर अभी है और घिरी आती है शाम kuchh apni raftaar badhaao, josh ko kuchh tughyaani do manzil kitni door abhi hai aur ghiri aati hai shaam
सारी उम्र की कीमत पर भी क़र्ज़ न उतरा रिश्तों का बेचैनी, ज़िल्लत, रुसवाई, हम को मिला है ये इनआम saari umr ki qeemat par bhi qarz na utra rishtoN ka bechaini, zillat, ruswaai, ham ko mila hai ye in'aam
सारी…

ग़ज़ल - रुख़ हवाओं का किधर है और मेरी मंज़िल कहाँ

रुख़ हवाओं का किधर है और मेरी मंज़िल कहाँ
इस तलातुम में न जाने खो गया साहिल कहाँ

रात का वीरान मंज़र, रास्ते ख़ामोश थे
दूर देता था सदाएँ जाने इक साइल कहाँ

अब तअस्सुब की लपट में क़ैद है सारा वतन
मुंह छुपाए हैं खड़े ये आलिम-ओ-फ़ाज़िल कहाँ 
उलझनें कैसी, कहाँ वो उल्फ़तें, वो रंजिशें
वो हमारी ज़िन्दगी में रह गया शामिल कहाँ 
जल रही है रूह तक, दिल थक गया है, ज़हन कुंद
ये कहाँ बेहिस सी ज़िद, वो जज़्बा-ए-कामिल कहाँ


आस्माँ की सिम्त हम देखा करें उम्मीद से
हम गुनहगारों पे होता है सितम नाज़िल कहाँ


और तो सब कुछ है, राहत है, सुकूँ भी है मगर
वो मचलती आरज़ू, वो ज़ीस्त का हासिल कहाँ



उस ने जो सोचा, जो चाहा, हम वो सब करते रहे
हम भला उसके इरादों से रहे ग़ाफ़िल कहाँ


इक निगाह-ए-मेहर-ओ-उल्फ़त, इक झलक, इक इल्तेफ़ात
ये मगर मेरी गुज़ारिश ग़ौर के क़ाबिल कहाँ


दर्द जब हद से बढ़ा तो हर तड़प जाती रही
रूह तक ज़ख़्मी हो जब तो फिर शिकस्ता दिल कहाँ


एक जुम्बिश दें नज़र को तो ख़ुदाई हो निसार
रह गए इस दौर में “मुमताज़” वो कामिल कहाँ


ग़ज़ल - नूर ये किस का रोज़ चुरा कर लाए है मेहर-ए-ताबाँ

चित्र
नूर ये किस का रोज़ चुरा कर लाए है मेहर-ए-ताबाँ
रोज़ समंदर की मौजों पर कौन बिखेरे अफ़शाँ
NOOR YE KIS KA ROZ CHURA KAR LAAEY HAI MEHR E TAABA'N ROZ SAMANDAR KI MAUJO'N PAR KAUN BIKHEREY AFSHAA'N
टूट गए सब प्यार के टाँके ज़ख़्म हुए सब उरियाँ तेज़ हुई लय दर्द की यारो, हार गया हर दरमाँ TOOT GAEY SAB PYAR KE TAANKE ZAKHM HUE SAB URIYAA'N TEZ HUI LAY DARD KI YAARO HAAR GAYA HAR DARMAA'N
रात की तीरा सर्द गली में शोर उठा जब ग़म का जाग उठा हर दर्द पुराना जाग उठा हर अरमाँ RAAT KI TEERA SARD GALI ME'N SHOR UTHA JAB GHAM KA JAAG UTHA HAR DARD PURAANA JAAG UTHA HAR ARMAA'N
इश्क़ की बाज़ी, जान का सौदा, दाग़, सितम, रुसवाई चार क़दम दुश्वार है चलना राह नहीं ये आसाँ ISHQ KI BAAZI, JAAN KA SAUDA, DAAGH, SITAM, RUSWAAI CHAAR QADAM DUSHWAAR HAI CHALNA, RAAH NAHI'N YE AASAA'N
जितनी बढ़ी सैलाब की शिद्दत उतना जुनूँ भी मचला नाव शिकस्ता पार हुई, हैरान खड़ा है तूफ़ाँ JITNI BADHI SAILAAB KI SHIDDAT, UTNA JUNOO'N BHI MACHLA NAAV SHIKASTA PAAR HUI, HAIRAAN KHADA HAI TOOFAA'N
ख़ास हुई इख़लास की ज़ौ फिरती ह…

माह-ए-कामिल डूब गया

चित्र
ख़्वाब नगर के दरियाओं में माह-ए-कामिल डूब गया
जानम तेरी झील सी गहरी आँखों में दिल डूब गया
khwaab nagar ke dariyaaoN meN maah e kaamil doob gaya
jaanam teri jheel si gehri aankhoN meN dil doob gaya

मेरे लहू के दरिया में पहले तो बातिल डूब गया
वहशत की गहराई में फिर मेरा क़ातिल डूब गया
mere lahoo ke dariya meN pehle to baatil doob gaya
wahshat ki gehraai meN phir mera qaatil doob gaya

कुछ ऐसी तुग़ियानी थी अपने जज़्बात की मौजों में
आँखों की कश्ती में बैठा था फिर भी दिल डूब गया
kuchh aisi tughyaani thi apne jazbaat ki maujoN meN
aankhoN ki kashti meN baitha tha, phir bhi dil doob gaya

साहिल भी था सामने और लहरों में भी वो जोश न था
पार उतरना आसाँ था पर दिल था ग़ाफ़िल, डूब गया
saahil bhi tha saamne, aur lehroN meN bhi wo josh na tha
paar utarna aasaaN tha, par dil tha ghaafil, doob gaya

कश्ती तो कमज़ोर है लेकिन सोचो तो, जाएंगे कहाँ
हैरत की है बात मगर वो देखो, साहिल डूब गया
kashti to kamzor hai lekin socho to, jaaenge kahan
hairat ki hai baat, magar wo dekho, saahil doob gaya

साँसो…

ग़ज़ल - हर मुसाफ़िर आप में इक कारवाँ हो जाएगा

हर मुसाफ़िर आप में इक कारवाँ हो जाएगा
चल पड़े गर तू तो ख़ुद इक दास्ताँ हो जाएगा
har musafir aap men ik kaarwaaN ho jaaega chal pade gar  tu to khud ik daastaaN ho jaaega
तू सफ़र अपना शुरू कर, धूप की तेज़ी न देख तपता सूरज तेरी ख़ातिर सायबाँ हो जाएगा tu safar apna shuru kar dhoop ki tezi na dekh tapta sooraj teri khaatir saaybaaN ho jaaega
मंज़िलों की सिम्त बढ़ जाएँगे ख़ुद तेरे क़दम रास्ता हर एक तेरा राज़दाँ हो जाएगा manzilon ki samt badh jaaenge khud tere qadam raastaa har ek tera raazdaaN ho jaaega
ये तकब्बुर, ये तफ़ख़्ख़ुर, ये अना सब रायगाँ जितना सिमटेगा तू उतना बेकराँ हो जाएगा ye takabbur ye tafakkhur ye anaa, sab raaygaaN jitna simtega tu utna bekaraaN ho jaaega
जुस्त को महदूद मत कर, सोच को परवाज़ दे तू नज़र को वुसअतें दे, आस्माँ हो जाएगा just ko mehdood mat kar soch ko parwaaz de tu nazar ko wus'aten de, aasmaaN ho jaaega
इस ज़मीं को नाप ले, रख आस्माँ पर तू क़दम दोनों आलम पर तू इक दिन हुक्मराँ हो जाएगा is zameeN ko naap le rakh aasmaaN par tu qadam donoN aalam par tu ik din hukmaraaN ho jaaega
ऊँची कर परवाज़ …