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Showing posts from 2019

किस को समझाएँ यहाँ हम दिल-ए-रंजूर की बात

किस को समझाएँ यहाँ हम दिल-ए-रंजूर की बात बुझते बुझते जो जला उस मह-ए-बे नूर की बात کس کو سمجھائیں یہاں ہم دلِ رنجور کی بات بجھتے بجھتے جو جلا اُس مہِ بے نور کی بات जल न जाएँ कहीं जलवे की तपिश से आँखें ताब-ए-नज़्ज़ारा अगर हो तो करो तूर की बात جل نہ جائیں کہیں جلوے کی تپش سے آنکھیں تابِ نظارہ اگر ہو تو کرو طور کی بات
आरज़ू मचली, तबीयत पे ख़ुमार आने लगा छेड़ दी किस ने सरापा मए-भरपूर की बात آرزو مچلی، طبیئت پہ خمار آنے لگا چھیڑ دی کس نے سراپا مئے بھرپور کی بات
ले के शहवत की अजब एक चमक आँखों में शेख़ जी करते रहे देर तलक हूर की बात لے کے شہوت کی اجب ایک چمک آنکھوں مین شیخ جی کرتے رہے دیر تلک حور کی بات
दार शरमाया, पशेमान हुआ दीन-ए-हक़
फिर अनल हक़ से अदा हो गई मंसूर की बात دار شرمایا، پشیمان ہوا دینِ حق پھر انا الحق سے ادا ہو گئی منصور کی بات
मुंतज़िर लम्हों की वुस'अत की न पूछो "मुमताज़" रात की बात भी लगती है बहुत दूर की बात منتظر لمحوں کی وسعت کی نہ پوچھو ممتازؔ

हर दिल है बदगुमान, अना हुक्मराँ है अब

हर दिल है बदगुमान, अना हुक्मराँ है अब रिश्तों के रखरखाव में ख़ाली ज़ियाँ है अब ہر دل ہے بدگمان، انا حکمراں ہے اب رشتوں کے رکھ رکھاؤ میں خالی زیاں ہے اب
देखा उन्हें तो दिल का समाँ और हो गया ख़ामोश है ज़ुबाँ, प नज़र में ज़ुबाँ है अब دیکھا اُنہیں تو دل کا سماں اور ہو گیا خاموش ہے زباں پہ نظر میں زباں ہے اب
वो छोड़ कर गया है सराब-ए-उम्मीद में लम्हों का तूल ज़ेहन पे बार-ए-गराँ है अब وہ چھوڑ کر گیا ہے سرابِ امید میں لمحوں کا طول زہن پہ بارِ گراں ہے اب
परवाज़ बस ख़याल की मंज़िल पे है अभी हाथों में हर शिकारी के देखो कमाँ है अब پرواز بس خیال کی منزل پہ ہے ابھی ہاتھوں میں ہر شکاری کے دیکھو کماں ہے اب
बचपन में जो बसाया था साहिल की रेत पर वो शहर हसरतों का, बता दे, कहाँ है अब بچپن میں جو بنایا تھا ساحل کی ریت پر وہ شہر حسرتوں کا بتا دے کہاں ہے اب
क्या जाने क्यूँ बहार भी नज़रें बचा गई गुलशन के हर शजर पे ख़िज़ाँ ही ख़िज़ाँ है अब کیا جانے کیوں بہار بھی نظریں بچا گئی گلشن کے ہر شجر پہ خزاں ہی خزاں ہے اب
अपनी तमाज़तों से मेरे पर जलाए क्यूँ इतना उदास किसके लिए आस्माँ है अब اپنی تمازتوں سے مرے پر جلائے کیوں اِتنا اُداس کس کے لئے آسما…

कोई हमदम, न आशना बाक़ी

कोई हमदम, न आशना बाक़ी अब यहाँ कुछ नहीं बचा बाक़ी کوئی ہم دم نہ آشنہ باقی اب یہاں کچھ نہیں بچا باقی
चंद यादों का इक ज़ख़ीरा है और जो कुछ था, मिट चुका, बाक़ी چند یادوں کا اک زخیرہ ہے اور جو کچھ تھا مٹ چکا باقی
जुस्तजू में अभी नज़र है मेरी है अभी दिल में इक हिरा बाक़ी جستجو میں ابھی نظر ہے مری ہے ابھی دل میں اک حرا باقی
हैं सज़ाएं तो पै ब पै जारी देखें, कब तक रहे जज़ा बाक़ी ہیں سزائیں تو پے بہ پے جاری دیکھیں کب تک رہے جزا باقی
मुंह ख़ज़ानों का खोल दे मौला हैं अभी कितने ही गदा बाक़ी منہ خزانوں کا کھول دے مولیٰ ہیں ابھی کتنے ہی گدا باقی
और तो कुछ नज़र नहीं आता रह गई गूंजती सदा बाक़ी اور تو کچھ نطر نہیں آتا رہ گئی گونجتی صدا باقی
अब ये बोसीदा तन उतर भी जाय

आशिक़ी का नशा नहीं बाक़ी

आशिक़ी का नशा नहीं बाक़ी दिल का वो मैकदा नहीं बाक़ी عاشقی کا نشہ نہیں باقی دل کا وہ میکدہ نہیں باقی
बेहिसी की ये इंतेहा तौबा दर्द दिल में ज़रा नहीं बाक़ी بیحسی کی یہ انتہا طوبہ درد دل میں ذرا نہیں باقی
इतने काँटे चुभे कि पाओं में अब कोई आबला नहीं बाक़ी اتنے کانٹے چبھے کہ پاؤں میں اب کوئی آبلہ نہیں باقی
दर्द ने तोड़ दीं हदें सारी ज़ब्त का सिलसिला नहीं बाक़ी درد نے توڑ دیں حدیں ساری ضبط کا سلسلہ نہیں باقی
ऐसी बेरब्तगी कि क्या कहिए कोई शिकवा गिला नहीं बाक़ी ایسی بےربطگی کہ کیا کہئے کوئی شکوہ گلہ نہیں باقی
एक तेरा ही अक्स था जिस में दिल का वो आईना नहीं बाक़ी ایک تیرا ہی عکس تھا جس میں دل کا وہ آئینہ نہیں باقی
ख़ैर "मुमताज़" बात ख़त्म हुई अब कोई वसवसा नहीं बाक़ी خیر ممتازؔ بات ختم ہوئی

ज़मीर और मतलब की यलग़ार में

ज़मीर और मतलब की यलग़ार में उजागर हुए ऐब किरदार में ضمیر اور مطلب کی یلغار میں اُجاگر ہوئے عیب کردار میں
गिरा है ज़मीर ऐसा अदवार में अना बेच डाली है बाज़ार में گرا ہے ضمیر ایسا ادوار میں انا بیچ ڈالی ہے بازار میں
न पूछो वहाँ ऐश राजाओं के जहां संत लिपटे हों व्यभिचार में نہ پوچھو وہاں عیش راجاؤں کے جہاں سنت لپٹے ہوں ویبھیچار میں
तमद्दुन ने हमको अता क्या किया कि इंसानियत थी फ़क़त ग़ार में تمدن نے ہم کو عطا کیا کیا کہ انسانیت تھی فقط غار میں
गुलों कि नज़ाकत ने ताईद की अजब सी कशिश है हर इक ख़ार में گلوں کی نزاکت نے تائید کی عجب سی کشش ہے ہر اک خار میں
है दी उम्र तो तजरुबे पाए हैं निहाँ हैं जो चांदी के हर तार में ہے دی عمر تو تجربے پائے ہیں نہاں ہیں جو چاندی کے ہر تار میں
न “मुमताज़” जीता यहाँ सच कभी ये सब मन्तक़ें यार बेकार में نہ ممتازؔ جیتا یہاں سچ کبھی یہ سب منطقیں یار بیکار میں यलग़ार-युद्ध, ऐब-त्रुटि, किरदार-चरित्र, अदवार में-युगों में, अना-खुद्दारी, तमद्दुन-सामाजिकता, फ़क़त-केवल, ग़ार-गुफा, ताईद-समर्थन, मन्तक़ें-लफ़्फ़ाज़ी।

दो ख़याल

दो ख़याल 1- मोहब्बत एक नाज़ुक चीज़ है, मासूम जज़्बा है मोहब्बत दिल की धड़कन है, खुली आँखों का सपना है मोहब्बत से ये दुनिया है 2- मोहब्बत झूठ है, धोका है, शहवत है, छलावा है जला दे रूह तक को जो ये इक ऐसा शरारा है मोहब्बत सिर्फ़ फ़ितना है 1- जीने की ख़्वाहिश है तो इक बार मर कर देख ले देखनी हो जिस को जन्नत इश्क़ कर के देख ले 2- इश्क़ में जन्नत नहीं लाखों जहन्नम हैं निहाँ इश्क़ दे जाता है दिल पर ज़िंदगी भर को निशां 1- इश्क़ जब मेहरबान होता है सारा आलम जवान होता है कहकशाँ लगती है हर राहगुज़र पाँव में आसमान होता है 2- इश्क़ जब मेहरबान होता है दिल का दुश्मन जहान होता है शोले राहों में बिखर जाते हैं ख़त्म नाम-ओ-निशान होता है 1- दो दिन की ज़िन्दगानी बेकार न हो जाए इसे प्यार में बिता ले

फ़र्श से अफ़लाक तक पहुंची है रुसवाई मेरी

फ़र्श से अफ़लाक तक पहुंची है रुसवाई मेरी जाने क्यूँ बेचैन रक्खे सब को दानाई मेरी فرش سے افلاک تک پہنچی ہے رسوائی مری جانے کیوں بے چین رکھے سب کو دانائی مری
कोई साया भी पड़े मुझ पर तो दम घुटता है अब मुझ को तन्हा एक पल छोड़े न तनहाई मेरी کوئی سایہ بھی پڑے مجھ پر تو دم گھٹتا ہے اب مجھ کو تنہا ایک پل چھوڑے نہ تنہائی مری
जिस जगह मैं हूँ, वहाँ कोई नज़र आता नहीं क़ैद मुझ को रात दिन रखती है यकताई मेरी جس جگہ میں ہوں وہاں کوئی نظر آتا نہیں قید مجھ کو رات دن رکھتی ہے یکتائی مری
कोई क्या समझे मेरे दिल की तहों के ज़ाविए ख़ुद मुझे कब नापनी आई है गहराई मेरी کوئی کیا سمجھے مرے دل کی تہوں کے زاوئے خود مجھے کب ناپنی آئی ہے گہرائی مری
वक़्त आया तो किसी दीवार का साया न था हाँ, यही दुनिया रही बरसों, तमाशाई मेरी وقت آیا تو کسی دیوار کا سایہ نہ تھا ہاں یہی دنیا رہی برسوں تماشائی مری
उस का वादा था करेगा हर दुआ हर दम क़ुबूल मांगती हूँ, तो नहीं होती है सुनवाई मेरी اُس کا وعدہ تھا، کریگا ہر دعا ہر دم قبول مانگتی ہوں تو نہیں ہوتی ہے شنوائی مری
रास्ता लंबा है, मंज़िल का निशां कोई नहीं चलने दे लेकिन न मुझ को आबलापाई मेरी