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ख़दशात दिल में पलते हैं

ख़दशात दिल में पलते हैं, आँखों में डर भी हैं पत्थर के शहर में कई शीशे के घर भी हैं
बरता है हम ने हस्ब-ए-ज़रुरत हर एक को गुल ही नहीं हैं, हाथ में तीर-ओ-तबर भी हैं
गो बहर-ए-ज़ात में हैं तलातुम हज़ारहा गहराई में उतर जो सको, तो गोहर भी हैं
वाक़िफ़ तो हम हैं ख़ूब तेरे हर कमाल से तेरी जफ़ागरी से मगर बेख़बर भी हैं
बीनाई की हुदूद प् थे हुक्मराँ कभी कुछ रोज़ से वो जलवे तेरे दर ब दर भी हैं
शादाब गुल्सितानों को शायद ख़बर नहीं ऐसी भी कुछ ज़मीनें हैं, जो बेशजर भी हैं
थकने की बाल-ओ-पर को इजाज़त नहीं अभी मेरी निगाह में अभी शम्स-ओ-क़मर भी हैं
"मुमताज़" उन के दिल में भी कुछ शर ज़रूर है पेशानी पर लिखे हुए कुछ बल इधर भी हैं
ख़दशात=अंदेशा, हस्ब-ए-ज़रुरत=ज़रूरत के मुताबिक़, गुल=फूल, तीर-ओ-तबर=तीर और कुल्हाड़ी, गो=हालाँकि, बहर-ए-ज़ात=अस्तित्व का समंदर, तलातुम=तूफ़ान, हज़ारहा

ज़हन-ओ-दिल पर इश्क़ का जादू नज़र आने लगे

ज़हन-ओ-दिल पर इश्क़ का जादू नज़र आने लगे हो मोअत्तर दीद और ख़ुशबू नज़र आने लगे
बात भी हम डर के करते हैं, कि अब किस बात में जाने किस को कौन सा पहलू नज़र आने लगे
ढालना होगा पसीने में लहू को इस तरह बख़्त पर इंसान का क़ाबू नज़र आने लगे
ऐसा लगता है कि अब हर तीरगी छंट जाएगी आज फिर उम्मीद के जुगनू नज़र आने लगे
जाग उठी शैतानियत, अब नेकियों की ख़ैर हो हर तरफ़ ख़ंजर ब कफ़ साधू नज़र आने लगे
आ गई शायद वही मंज़िल मोहब्बत की, जहाँ उस का ही चेहरा हमें हर सू नज़र आने लगे
एक बस इंसानियत नायाब है इस देश में अब यहाँ बस मुस्लिम-ओ-हिन्दू नज़र आने लगे
इस क़दर खो जाए तेरी ज़ात में मेरा वजूद "काश ये भी हो कि मुझ में तू नज़र आने लगे"
जब बरहना रक्स पर आमादा हो फ़ितना गरी हर तरफ़ "मुमताज़" हा-ओ-हू नज़र आने लगे

इस तरक़्क़ी का हमें इनआम ये कैसा मिला

इसतरक़्क़ीकाहमेंइनआमयेकैसामिला दौर-ए-हाज़िरमेंहमेंहरआदमीतन्हामिला
हरतअल्लुक़ख़ाम, हरइकरिश्ता