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Showing posts from June 24, 2019

है अधूरा आदमीयत का निज़ाम

है अधूरा आदमीयत का निज़ाम हर बशर है आरज़ूओं का ग़ुलाम
आज फिर देखा है उस ने प्यार से आज फिर दिल आ गया है ज़ेर-ए-दाम
तोडना होगा तअस्सुब का ग़ुरूर है ज़रूरी इस नगर का इनहेदाम
हाय रे एहल-ए-ख़िरद की चूँ-ओ-चीं वाह, ये दीवानगी का एहतेशाम
थक गए हो क्यूँ अभी से दोस्तो बस, अभी तक तो चले हो चार गाम
देखते हैं, आगही क्या दे हमें अब तलक तो आरज़ू है तशनाकाम
आदमी की बेकराँ तन्हाइयाँ चार सू फैला हुआ ये अज़दहाम
ज़िन्दगी से जंग अब हम क्या करें