गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

ये माना, बेरुख़ी हम से यूँ ही फ़रमाओगे साहब

ये माना, बेरुख़ी हम से यूँ ही फ़रमाओगे साहब
अकेले में मगर ग़ज़लें हमारी गाओगे साहब

ये किसकी खोज में चोरी छुपे नज़रें भटकती है
कोई जो पूछ बैठा, क्या उसे बतलाओगे साहब

ये माना, हम तुम्हारी राह में दीवार हैं, लेकिन
हमें ढा दोगे तो साया कहाँ फिर पाओगे साहब

हमारे दर्द का शायद तुम्हें तब होगा अंदाज़ा
जो तुम भी तीर कोई अपने दिल पर खाओगे साहब

अभी तो कर रहे हो तुम बहुत तनहाई की ख़्वाहिश
करोगे क्या जो तनहाई में भी घबराओगे साहब

ये बेपरवाई, ये बेमेहरियाँ, ये बेरुख़ी पैहम
तड़प जाओगे तुम भी जो हमें तड़पाओगे साहब

जहाँ है ख़ुदग़रज़ ये क्या तुम्हारे नाज़ उठाएगा
ये तेवर कजअदाई के किसे दिखलाओगे साहब

सता कर हमको ख़ुश हो लो, मगर जब हम नहीं होंगे
हमेशा वाहमों से ख़ुद को फिर बहलाओगे साहब

चलो, हम तो बिलआख़िर कर ही लेंगे तर्क-ए-उलफ़त भी
ये फिर कहते हैं हम, देखो, बहुत पछताओगे साहब

तअल्लुक़ तो क़तअ कर ही चुके हो, ये भी बतला दो  
ये लाश उजड़ी मोहब्बत की कहाँ दफ़नाओगे साहब

बहार आएगी गुलशन में हमारे बाद भी लेकिन
खिलेंगे फूल गुलशन में तो तुम कुम्हलाओगे साहब

चले तो जा रहे हो रूठ कर पर ये भी सोचा है?

कहाँ से ढूँढ कर मुमताज़ को फिर लाओगे साहब 

गीत - ऐ ख़ुदा-ए-दो जहाँ

ऐ ख़ुदा-ए-दो जहाँ
है ये कैसा इम्तेहाँ
क्यूँ मुझे दे दी तमन्ना बेकराँ
ये तेरी जादूगरी
लूट कर ख़ुशियाँ मेरी
मुँह छुपा कर खो गया है तू कहाँ

क्यूँ मेरे दिल में जगाए आरज़ू के सिलसिले
क्यूँ मेरी आँखों को बख़्शे ख़्वाब के ये क़ाफ़िले
क्यूँ मेरे दिल के जहाँ को पारा पारा कर दिया
और आँखों में मेरी फिर क्यूँ अँधेरा कर दिया
लूट कर वो आरज़ू का कारवाँ

खेलता है तू दिलों से तेरा ये दस्तूर है
लेकिन ऐ मालिक ये दिल मेरा ग़मों से चूर है
हम खिलौने हैं तेरे तो हम में दिल क्यूँ रख दिया
दिल बनाया भी तो दर्द-ए-मुस्तक़िल क्यूँ रख दिया
क्यूँ बनाया ये तमन्ना का जहाँ

लूट लीं ख़ुशियाँ तो अब ये आरज़ू भी लूट ले
ये मोहब्बत की तलब, ये जुस्तजू भी लूट ले
कर दिया बर्बाद दिल को तो इसे अब तोड़ दे
कुछ नहीं इसमें तो अब क़िस्मत का शीशा फोड़ दे
दिल, मोहब्बत, ज़िन्दगी, सब रायगाँ


पारा पारा टुकड़ा टुकड़ा, दर्द-ए-मुस्तक़िल हमेशा होने वाला दर्द, रायगाँ बेकार 

हमारी काविशों की एक दिन यूँ आबरू होगी

हमारी काविशों की एक दिन यूँ आबरू होगी
मोहब्बत सर झुकाएगी तमन्ना बावज़ू होगी

है इतनी बेकराँ, फैली हुई है सारे आलम में
जहाँ हम तुम नहीं होंगे वहाँ भी आरज़ू होगी

फ़ना कर के हमें चेहरा छुपाती फिर रही है वो
हम उसका हाल पूछेंगे जो हसरत रू ब रू होगी

किसी सूरत हमारी सल्तनत होगी ज़माने में
यहाँ जब हम नहीं होंगे, हमारी जुस्तजू होगी

ये ज़हन-ए-मुंतशिर, ये ज़ख़्मी दिल और वस्ल का वादा
ज़बाँ मफ़्लूज है, क्या ख़ाक उनसे गुफ़्तगू होगी ?

मिले तो हम मिलेंगे अब  मोहब्बत के जनाज़े पर
अना की धज्जियों से दिल की हर हसरत रफ़ू होगी

तसव्वर भी, तफ़क्कुर भी, अना भी, आज़माइश भी
वहाँ कोई न पहुँचेगा जहाँ मुमताज़ तू होगी


काविश खोज, बावज़ू वज़ू की हुई, बेकराँ अथाह, रू ब रू आमने सामने, जुस्तजू तलाश, ज़हन-ए-मुंतशिर बिखरा हुआ दिमाग़, वस्ल मिलन, मफ़्लूज लकवा ग्रस्त, गुफ़्तगू बात चीत, तसव्वर कल्पना, तफ़क्कुर विचार शीलता, अना अहं

बुज़ुर्गों की बुज़ुर्गी आजकल घबराई है साहब - एक बहुत पुरानी ग़ज़ल

बुज़ुर्गों की बुज़ुर्गी आजकल घबराई है साहब
जवाँ नेताओं पर कुछ यूँ जवानी आई है साहब

ठिकाना ही नहीं कोई कि किस पर मेहरबाँ होगी
सियासत की ये महबूबा बड़ी हरजाई है साहब

खिलाड़ी बेच डाले, टीमें बेचीं, बेचे सौ सपने
सभी ने अपनों को ये रेवड़ी बँटवाई है साहब

किसी के लब पे गाली है किसी के हाथ में तरकश
सभी की अपनी डफ़्ली, अपनी ही शहनाई है साहब

हैं संसद में सभी इक दूसरे से बढ़ के बाज़ीगर
कोई रहज़न, कोई क़ातिल, कोई बलवाई है साहब

कोई अपना अजेंडा भी रहे ये क्या ज़रूरी है
यहाँ तो सद्र-ए-आला सबका बाबा माई है साहब

हमारे मुंह पे हम जैसी तो उनके मुंह पे उन जैसी
हो सर्कोज़ी कि ओबामा, हर इक हरजाई है साहब

विकी लीक्स पर ये एक्शन, ये असांजे की गिरफ़्तारी
दबी है पूंछ तो नागन ये अब बल खाई है साहब

हैं कितने मेहरबाँ मुमताज़ सब क़स्साब-ए-क़ातिल पर

हमारा इंडिया भी कैसा हातिमताई है साहब 

ये कैसा दर्द है

ये कैसा दर्द है कैसी कसक है ये क्यूँ हर   पल   तेरी   यादें मुझे बेचैन रखती हैं तेरी आँखें मेरे दिल पर वफ़ा का नाम लिखती हैं ये ...