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March 21, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - कैसा अजब ख़ुमार है, कैसा ये ख़्वाब है

कैसा अजब ख़ुमार है, कैसा ये ख़्वाब है इस लम्स से तो रूह तलक आब आब है KAISA AJAB KHUMAAR HAI KAISA YE KHWAAB HAI IS LAMS SE TO ROOH TALAK AAB AAB HAI
उल्फ़त करोगे सर्फ़ तो उल्फ़त कमाओगे रिश्तों की इस किताब का सीधा हिसाब है ULFAT KAROGE SARF TO ULFAT KAMAAOGE RISHTON KI IS KITAAB KA SEEDHA HISAAB HAI
बीनाई ज़ख़्म ज़ख़्म, निगाहें लहू लहू आँखों ने अबके देख लिया कैसा ख़्वाब है BEENAAI ZAKHM ZAKHM NIGAAHEN LAHU LAHU AANKHON NE AB KE DEKH LIYA KAISA KHWAAB HAI
नाआशना है ज़ीस्त की हर एक इबारत नाख़्वांदा हैं हुरूफ़, ये कैसी किताब है NAA'AASHNA HAI ZEEST KI HAR EK IBAARAT NAAKHWAANDA HAIN HUROOF YE KAISI KITAAB HAI
जलती है सांस सांस, सुलगता है सारा तन लगता है मुझ से लिपटा हुआ इक शेहाब है JALTI HAI SAANS SAANS SULAGTA HAI SAARA TAN LAGTA HAI MUJH SE LIPTA HUA IK SHEHAAB HAI
भटका रहा है दूर तलक मुझ को रात-दिन सहरा-ए-ज़ात में जो जुनूँ का सराब है BHATKA RAHA HAI DOOR TALAK MUJH KO RAAT DIN SEHRA E ZAAT MEN JO JUNOON KA SARAAB HAI
“मुमताज़” जी संभाल के रखिए मता-ए-ज़ात चलिये ज़रा संभल के, ज़माना ख़राब है 'MUMTAZ' JI SA…