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Showing posts from December 11, 2018

तेरे दर पे ख़ैरात क्या क्या बँटी है

तेरे दर पे ख़ैरात क्या क्या बँटी है मगर मेरा दामन अभी तक तही है
किया है अता दर्द का इक ख़ज़ाना सितमगर भी मेरा बला का सख़ी है
अभी रश्क करती है तक़दीर मुझ पर अभी मेरी शाख़-ए-तमन्ना हरी है
मेरे दिल से ले कर तेरी बरहमी तक वरक़ दर वरक़ इक कहानी लिखी है
कभी कुफ़्ल मेरी ज़ुबाँ पर लगे हैं कभी पाँव में उस के बेड़ी पड़ी है
तलब से सिवा उस को बख़्शा है रब ने मुक़द्दर की “मुमताज़” कितनी धनी है
ترے در پہ خیرات کیا کیا بٹی ہے مگر میرا دامن ابھی تک تہی ہے
کیا ہے عطا درد کا اک خزانہ ستمگر بھی میرا بلا کا سخی ہے
ابھی رشق کرتی ہے تقدیر مجھ پر ابھی میری شاخِ تمنا ہری ہے
مرے دل سے لے کر تری برہمی تک ورق در ورق اک کہانی لکھی ہے
کبھی کفل میری زباں پر لگے ہیں کبھی پاؤں میں اس کے بیڑی پڑی ہے
طلب سے سوا اس کو بخشا ہے رب نے مقدر کی ممتازؔ کتنی دھنی ہے