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Showing posts from February 14, 2019

अस्बियत का ग़ुबार छट जाए

अस्बियत का ग़ुबार छट जाए तीरगी खुद में ही सिमट जाए عصبیت کا غبارچھٹ جائے تیرگی خود میں ہی سمٹ جائے
वो शजर दिल का फिर फले कैसे अपनी ही ज़ात से जो कट जाए وہ شجر دل کا پھر پھلے کیسے اپنی ہی ذات سے جو کٹ جائے
जब ज़ुबां अर्ज़ ए हाल की सोचे दिल ग़ुबार ए अना से अट जाए جب زباں عرضِ حال کی سوچے دل غبارِ انا سے اٹ جائے
कह दो कोई ये दश्त ए वहशत से अब मेरे रास्ते से हट जाए کہہ دو کوئی یہ دشتِ وحشت سے اب مرے راستے سے ہٹ جائے
हौसला ज़र्ब दे जो लहरा कर पत्थरों का जिगर भी फट जाए حوصلہ ضرب دے جو لہرا کر پتھروں کا جگر بھی پھٹ جائے
रात की ज़ुल्फ़ जब परेशाँ हो मुझ से हर तीरगी लिपट जाए رات کی زلف جب پریشاں ہو مجھ سے ہر تیرگی لپٹ جائے