Posts

Showing posts from December 14, 2018

क़ज़ा*1 की क्या कहें, ठहरी न ज़िन्दगी मुख़लिस*2

क़ज़ा*1 की क्या कहें, ठहरी न ज़िन्दगी मुख़लिस*2 अज़ीज़*3 ग़म ही हुए हैं न है ख़ुशी मुख़लिस قضا کی کیا کہیں، ٹھہری نہ زندگی مخلص عزیز غم ہی ہوئے ہیں نہ ہے خوشی مخلص
किताब चेहरा*4 ज़माने में रब्त*5 मस्नूई*6 यहाँ हज़ारों मिले हम को काग़ज़ी मुख़लिस کتاب چہرہ زمانے میں ربط مصنوعی یہاں ہزاروں ملے ہم کو کاغزی مخلص
लहू के प्यासे दरिंदों से रहम की उम्मीद? कभी हुई है किसी की दरिंदगी मुख़लिस? لہو کے پیاسے درندوں سے رحم کی امید؟ کبھی ھوئی ہے کسی کی درندگی مخلص؟
जदीद*7 दौर में इंसाफ़ बेचा जाता है ग़रीब लोगों की होगी न आदिली*8 मुख़लिस جدید دور میں انساف بیچا جاتا ہے غریب لوگوں کی ہوگی نہ عادلی مخلص
ज़मीर बेच दिया है हर एक ने अपना रहे इमाम*9 ही मुखलिस, न मुक़्तदी*10 मुख़लिस ضمیر بیچ دیا ہے ہر ایک نے اپنا رہے امام ہی مخلص، نہ مقتدی مخلص
अज़ीयतें*11 भी वफ़ा में अज़ीज़ होती हैं है ख़ार*12 ख़ार से लिपटी कली कली मुख़लिस عذیئتیں بھی وفا میں عزیز ہوتی ہیں ہے خار خار سے لپٹی کلی کلی مخلص
ये दिल तो चीज़ ही क्या है हयात*13 हार दें हम कोई दिखाओ तो “मुमताज़” आदमी मुख़लिस یہ دل تو چیز ہی کیا ہے حیات ہار دیں ہم کوئی دکھاؤ تو ممتازؔ آدمی مخلص *1- मौत, *2- सच्ची *3- प…