संदेश

December 18, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तरही ग़ज़ल - कहाँ तक न जाने मैं आ गई

कहाँ तक न जाने मैं आ गई गुम रात दिन के शुमार में कहीं क़ाफ़िला भी वो खो गया इन्हीं गर्दिशों के ग़ुबार में
KAHA'N TAK NA JAANE MAI'N AA GAI, GUM RAAT DIN KE SHUMAAR ME'N
KAHI'N QAAFILAA BHI WO KHO GAYA, INHI'N GARDISHO'N KE GHUBAAR ME'N
न कोई रफ़ीक़, न आशना, न अदू, न कोई रक़ीब है मैं हूँ कब से तन्हा खड़ी हुई इस अना के तंग हिसार में NA KOI RAFEEQ NA AASHNA, NA ADOO NA KOI RAQEEB HAI MAI'N HOO'N KAB SE TANHAA KHADI HUI, IS ANAA KE TANG HISAAR ME'N
है अजीब फ़ितरत-ए-बेकराँ कि सुकूँ का कोई नहीं निशाँ कभी शादमाँ हूँ गिरफ़्त में कभी मुंतशिर हूँ फ़रार में HAI AJEEB FITRAT E BEKARAA'N KE SUKO'N KA KOI NISHAA'N NAHI'N KABHI SHAADNAA'N HOO'N GIRAFT ME'N, KABHI MUNTASHIR HOO'N FARAAR ME'N
वो शब-ए-सियाह गुज़र गई मेरी ज़िन्दगी तो ठहर गई है अजीब सी कोई बेकली कोई कश्मकश है क़रार में WO SHAB E SIYAAH GUZAR GAI, MERI ZINDAGI TO THEHER GAI HAI AJEEB SI KOI BEKALI, KOI KASH MA KASH HAI QARAAR ME'N
खिले गुल ही गुल हैं हर एक सिम्त हद्द-ए-निगाह तलक मग…