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January 4, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - तश्नगी को तो सराबों से भी छल सकते थे

तश्नगी कोतोसराबोंसेभीछलसकते  थे इकइनायतसे  मेरेख़्वाबबहलसकते  थे
तुमनेचाहाहीनहींवर्ना कभीतो  जानां मेरे  टूटेहुएअरमाँ भी  निकलसकते  थे
तुम  को  जानाथाकिसीऔरही  जानिब, माना दोक़दमफिरभी  मेरे  साथतो  चलसकते  थे
काविशोंमेंही  कहींकोईकमीथी , वर्ना येइरादेमेरीक़िस्मतभी  बदलसकते  थे
रासआजाताअगरहमको  अनाकासौदा ख़्वाब  आँखोंकेहक़ीक़त में  भी  ढलसकते  थे
हम  को  अपनीजोअना  का  नसहारामिलता लडखडाएथे  क़दम  यूँ , के  फिसलसकते  थे
इसक़दरसर्दन  होतीजो  अगर  दिलकीफ़ज़ा