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Showing posts from July 10, 2018

जब तलक लब वज़ू नहीं करते

जब तलक लब वज़ू नहीं करते हम तेरी गुफ़्तगू नहीं करते
हम अबस हा-ओ-हू नहीं करते ख़ामुशी को लहू नहीं करते
ख़ुद हमारी तलाश में है तू हम तेरी जुस्तजू नहीं करते
डर गए हैं शिकस्त से इतना अब कोई आरज़ू नहीं करते
हर खुले ज़ख़्म में है अक्स उस का यूँ इन्हें हम रफ़ू नहीं करते
ज़ख़्म भी दे, वो हाल भी पूछे ये इनायत अदू नहीं करते
सारे एहसास मुंतशिर हैं अब क्या सितम रंग-ओ-बू नहीं करते
दिल को इसरार जिस प है इतना हम वही गुफ़्तगू नहीं करते
ख़ाक होने लगे वो मुर्दा पल अब वो “मुमताज़” बू नहीं करते

एहसास-ए-रेग-ए-जाँ में वो सराब का तअक़्क़ुब

एहसास-ए-रेग-ए-जाँ में वो सराब का तअक़्क़ुब कब तक करोगे आख़िर इक ख़्वाब का तअक़्क़ुब
हमें दे रहा है धोका ये हुबाब का तअक़्क़ुब अभी उम्र कर रही है जो शबाब का तअक़्क़ुब
दिखलाएँ जाने क्या क्या ये तक़ाज़े मसलहत के ख़ुर्शीद सी तबीयत, मेहताब का तअक़्क़ुब
ये करिश्मा भी है मुमकिन जो बलन्द हो इरादा कोई नाव कर रही हो गिर्दाब का तअक़्क़ुब
ये जुनूँ की आज़माइश, ये है वहशतों की साज़िश मुझे मार ही न डाले ये अज़ाब का तअक़्क़ुब
कभी ज़ेहन दर ब दर है, कभी मुंतशिर तबीअत वही इज़्तराब-ए-पैहम सीमाब का तअक़्क़ुब
कभी कोई पल सुकूँ का न हुआ नसीब मुझ को मेरी ज़िन्दगी मुसलसल सैलाब का तअक़्क़ुब
तुझे तोड़ देगा आख़िर ये तेरा जुनून-ए-बे जा
“मुमताज़” तर्क कर दे नायाब का तअक़्क़ुब

ये शिद्दत तश्नगी की बढ़ रही है अश्क पीने से

ये शिद्दत तश्नगी की बढ़ रही है अश्क पीने से हमें वहशत सी अब होने लगी मर मर के जीने से
बड़ी तल्ख़ी है लेकिन इस में नश्शा भी निराला है हमें मत रोक साक़ी ज़िन्दगी के जाम पीने से
हर इक हसरत को तोड़े जा रहे हैं रेज़ा रेज़ा हम उतर जाए ये बार-ए-आरज़ू शायद कि सीने से
अभी तक ये फ़सादों की गवाही देती रहती है लहू की बू अभी तक आती रहती है ख़ज़ीने से
बिखर जाएगा सोना इस ज़मीं के ज़र्रे ज़र्रे पर ये मिट्टी जगमगा उट्ठेगी मेहनत के पसीने से
हमारे दिल के शोलों से पियाला जल उठा शायद लपट सी उठ रही है आज ये क्यूँ आबगीने से
ये जब बेदार होते हैं निगल जाते हैं ख़ुशियों को ख़लिश के अज़्दहे लिपटे हैं माज़ी के दफ़ीने से
हमें तो ज़िन्दगी ने हर तरह आबाद रक्खा है तो क्यूँ “मुमताज़” अब लगने लगा है ख़ौफ़ जीने से