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March 27, 2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ग़ज़ल - भटकती फिर रही है मुस्तक़िल अब दश्तगाहों में

भटकती फिर रही है मुस्तक़िल अब दश्तगाहों में अजब अंदाज़ से है ज़िन्दगी अटकी दोराहों में BHATAKTI PHIR RAHI HAI MUSTAQIL ABDASHTGAAHON MEN AJAB ANDAAZ SE HAI ZINDAGI ATKI DORAAHON MEN
पलट कर अपने माज़ी को कभी आवाज़ देती हूँ कभी घबरा के खो जाती हूँ मुस्तक़बिल की बाहों में PALAT KAR APNE MAAZI KO KABHI AAWAZ DETI HOON KABHI GHABRA KE KHO JAATI HOON MUSTAQBIL KI BAAHON MEN
अमीरों में हमारा कोई भी सानी नहीं साहब ज़मीं क़दमों तले है आसमाँ है अपनी बाहों में AMEERON MEN HAMAARA KOI BHI SAANI NAHIN SAAHAB ZAMEEN QADMON TALE HAI AASMAAN HAI APNI BAAHON MEN
चुभन से मंज़रों की डर के आँखें बंद तो कर लीं चुभे जाते हैं मंज़र ख़्वाब के अबके निगाहों में CHUBHANSEMANZARONKIDARKE AANKHEN BAND TO KAR LEEN CHUBHE JAATE HAIN MANZAR KHWAAB KE AB KE NIGAAHON MEN
करम कुछ वक़्त का है और कुछ हालात की मर्ज़ी हमारा ज़िक्र भी आ ही गया आख़िर तबाहों में KARAM KUCHH WAQT KA HAI AUR KUCHH HAALAAT KI MARZI HAMAARA ZIKR BHIAA HIGAYA AAKHIR TABAAHON MEN
कमी कोई न रह जाए कि जश्न-ए-मर्ग-ए-हसरत है चराग़ाँ हो रहा है आज दिल की ख़ानक़ाहों में KAMI KOI NA RE…