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ग़ज़ल - कभी तक़दीर ने लूटा, कभी वहशत ने ठुकराया

कभी तक़दीर ने लूटा, कभी वहशत ने ठुकराया
हज़ारों कोशिशें कर लीं हमें जीना न रास आया
KABHI TAQDEER NE LOOTA KABHI WAHSHAT NE THUKRAAYA
HAZAARON KOSHISHEN KAR LEEN HAMEN JEENA NA RAAS AAYA

वही, जिसके लिए हमने वजूद अपना मिटा डाला
उसी ने दर्द-ए-लाफ़ानी का तोहफ़ा हमको लौटाया
WAHI JIS KE LIYE HAM NE WAJOOD APNA MITA DAALAA
USI NE DARD E LAAFAANI KA TOHFAA HAM KO LAUTAAYA

खड़े हैं दर्द के साहिल पे और ये सोचते हैं हम
सफ़र का शौक़ किस मंज़िल पे हमको आज ले आया
KHADE HAIN DARD KE SAAHIL PE AUR YE SOCHTE HAIN HAM
SAFAR KA SHAUQ KIS MANZIL PE HAM KO AAJ LE AAYA

चली पुरवाई तो दिल की सभी चोटें उभर आईं
मगर इक याद ने दिल के सभी छालों को सहलाया
CHALI PURWAAI TO DIL KI SABHI CHOTEN UBHAR AAIN
MAGAR IK YAAD NE DIL KE SABHI CHHAALON KO SAHLAAYA

हद-ए-बीनाई तक तन्हाई है, वहशत है, ज़ुल्मत है
मोहब्बत ने हमें ये आज किस मंज़िल पे पहुंचाया
HAD E BEENAAI TAK TANHAAI HAI WAHSHAT HAI ZULMAT HAI
MOHABBAT NE HAMEN YE AAJ KIS MANZIL PE PAHUNCHAAYA

ये आलम नफ़्सा-नफ़्सी का, मसाइल अपने काफ़ी हैं
ये सोचे कौन ऐसे में कि क्या भूखा है हम…