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Showing posts from November, 2018

ज़हन-ए-बेहिस को जगा दे वो तराना चाहिए

ज़हन-ए-बेहिस को जगा दे वो तराना चाहिए जीत का इक ख़्वाब आँखों में सजाना चाहिए
दिल के सोने को बनाना है जो कुंदन, तो इसे आतिश-ए-जहद-ए-मुसलसल में तपाना चाहिए
रंज हो या उल्फ़तें हों, हसरतें हों या जुनूँ कोई भी जज़्बा हो लेकिन वालेहाना चाहिए
पेट की आतिश में जल जाता है हर ग़म का निशाँ ज़िन्दगी कहती है, मुझ को आब-ओ-दाना चाहिए
दिल तही, आँखें तही, दामन तही, लेकिन मियाँ आरज़ूओं को तो क़ारूँ का ख़ज़ाना चाहिए
अक़्ल कहती है, क़नाअत कर लूँ अपने हाल पर और बज़िद है दिल, उसे सारा ज़माना चाहिए
रफ़्ता रफ़्ता हर ख़ुशी “मुमताज़” रुख़सत हो गई अब तो जीने के लिए कोई बहाना चाहिए
आतिश-ए-जहद-ए-मुसलसल - लगातार जद्द-ओ-जहद की आग, आब-ओ-दाना - दाना -पानी, क़नाअत - संतोष, बज़िद - ज़िद पर आमादा, रफ़्ता रफ़्ता - धीरे-धीरे, रुख़सत - विदा

zahn-e-behis ko jagaa de wo taraana chaahiye
jeet ka ik khwaab aankhoN meN sajaana chaahiye

dil ke sone ko banaana hai jo kundan, to ise
aatish-e-jahd-e-musalsal meN tapaana chaahiye

ranj ho ya ulfateN hoN, hasrateN hoN ya junooN
koi bhi jazba ho lekin waalehaana chaahiye

pet ki aatish meN jal jaata hai har gham …

ज़ख़्म महरूमी का भरने से रहा

ज़ख़्ममहरूमीकाभरनेसेरहा "कर्बकासूरजबिखरनेसेरहा"
ज़ीस्तहीगुज़रेतोअबगुज़रेमियाँ वोहसींपलतोगुज़रनेसेरहा
खेलतेआएहैंहमभीजानपर मुश्किलोंसेदिलतोडरनेसेरहा
फ़ैसलाहमहीकोईकरलेंचलो वोतोयेएहसानकरनेसेरहा
पलख़ुशीकेपरलगाकरउड़गए वक़्तहीठहरा, ठहरनेसेरहा
हैग़नीमतलम्हाभरकीभीख़ुशी अबमुक़द्दरतोसँवरनेसेरहा
जोशकीगर्मीसेपिघलेगाक़फ़स

हम पर जो हैं अज़ीज़ों के एहसान मुख़्तलिफ़

हम पर जो हैं अज़ीज़ों के एहसान मुख़्तलिफ़ लगते रहे हैं हम पे भी बोहतान मुख़्तलिफ़
हर एक रहनुमा का है ऐलान मुख़्तलिफ़ हैं मसलेहत के थाल में ग़लतान मुख़्तलिफ़
बिखरे हुए हैं ज़ीस्त के हैजान मुख़्तलिफ़ टुकड़ों में दिल के रहते हैं अरमान मुख़्तलिफ़
होगा क़दम क़दम पे इरादों का इम्तेहाँ इस रास्ते में आएँगे बोहरान मुख़्तलिफ़
खुलते रहे हयात के हर एक मोड़ पर तक़दीर की किताब के उनवान मुख़्तलिफ़
इस्लाम आज कितने ही ख़ानों में बँट गया मसलक जुदा जुदा हुए, ईमान मुख़्तलिफ़
ये और बात, हारा नहीं हम ने हौसला गुजरे हमारी राह से तूफ़ान मुख़्तलिफ़
धोका छलावा ज़ख़्मी अना और शिकस्ता दिल “मुमताज़” हैं ख़ुलूस के नुक़सान मुख़्तलिफ़
मुख़्तलिफ़ – अलग अलग, बोहतान – झूठा इल्ज़ाम, रहनुमा – लीडर, मसलेहत – पॉलिसी, ग़लतान – लुढ़कने वाला, ज़ीस्त – ज़िन्दगी, हैजान – जोश, बोहरान – अड़चन, हयात – ज़िन्दगी, उनवान – शीर्षक, मसलक – रास्ता, तरीका, अना – अहं, ख़ुलूस – सच्चाई

ham par jo hain azizoN ke ehsaan mukhtalif
lagte rahe haiN ham pe bhi bohtaan mukhtalif

har ek rahnuma ka hai ailaan mukhtalif
haiN maslehat ke thaal meN ghaltaan mukhtalif

bikhre hue haiN zeest ke haijaan mukhtalif

ज़मीं क्या, आसमानों पर भी है चर्चा मोहम्मद का

ज़मीं क्या, आसमानों पर भी है चर्चा मोहम्मद का तभी तो रश्क ए जन्नत बन गया बतहा मोहम्मद का
इबादत पर नहीं, उन की शफ़ाअत पर भरोसा है शफ़ाअत हश्र में होगी, ये है वादा मोहम्मद का
जहाँ तो क्या, उन्हें रब्ब ए जहाँ महबूब रखता है ये आला मरतबा दुनिया में है तनहा मोहम्मद का
जिसे नूर ए अज़ल के रंग से ढाला है ख़ालिक़ ने कोई सानी तो क्या, देखा नहीं साया मोहम्मद का
वो हैं खत्मुन नबी, हादी ए कुल, कुरआन सर ता पा है नस्ल ए आदमी के वास्ते तोहफ़ा मोहम्मद का
वो मख़्लूक़ ए ख़ुदा के वास्ते रहमत ही रहमत हैं मगर इंसान ने एहसाँ नहीं माना मोहम्मद का
लकीर इक नूर की खिंचती गई, गुज़रे जिधर से वो ज़मीं से आसमाँ तक देखिये जलवा मोहम्मद का
zameeN kya, aasmaanoN par bhi hai charcha Mohammad ka tabhi to rashk e jannat ho gaya bat'haa Mohammad ka

नूर अपना मेरी हस्ती में ज़रा हल कर दे

नूरअपनामेरीहस्तीमेंज़राहलकरदे इकज़राहाथलगादे, मुझेसंदलकरदे
ज़ेर-ओ-बमराहकेचलनेनहींदेतेमुझको तूजोचाहेतोहरइकराहकोसमतलकरदे
यूँतोहरवक़्तचुभाकरतीहैइकयादमुझे शामआएतोमुझेऔरभीबेकलकरदे
तेरेशायान-ए-ख़ुदाईहोंअताएँतेरी सारीमहरूमीकोयारबतूमुकफ़्फ़लकरदे
ज़ुल्मकी, यासकी, बदबख्ती की, महरूमीकी "सारीदुनियाकोमेरीआँखोंसेओझलकरदे"
अबन"मुमताज़" अधूरीरहेहसरतकोई

हर कहीं है अक्स तेरा हर कली में तेरी बू

हरकहींहैअक्सतेराहरकलीमेंतेरीबू इसज़मींसेउसज़माँतकहरकहींबसतूहीतू
हूँगुनहसरतापालेकिनफिरभीऐमेरेग़फ़ूर मासियतहैमेरीआदत, औररहमततेरीख़ू
कायनातोंकेभँवरमेंफिररहेहैंबेक़रार जानेलेजाएकहाँअबहमकोतेरीआरज़ू
ऐमेरेमालिक, तेरीरहमतहमेंदरकारहै भरगयाहैइसज़मींपरअबगुनाहोंकासुबू

जहाँ सजदा रेज़ है ज़िन्दगी जहाँ कायनात निसार है

जहाँ सजदा रेज़ है ज़िन्दगी जहाँ कायनात निसार है
जहाँ हर तरफ हैं तजल्लियाँ, मेरे मुस्तफ़ा का दयार है
कहाँ आ गई मेरी बंदगी, है ये कैसा आलम-ए-बेख़ुदी न तो होश है न वजूद है ये बलन्दियों का ख़ुमार है
तेरी इक निगाह-ए-करम उठी तो मेरी हयात सँवर गई तेरा इल्तेफ़ात न हो अगर तो क़दम क़दम मेरी हार है
दर-ए-मुस्तफ़ा से गुज़र गई तो नसीम-ए-सुबह महक उठी चली छू के गुंबद-ए-सब्ज़ को तो किरन किरन पे निखार है
जो बरस गईं मेरी रूह पर वो थीं नूर-ए-मीम की बारिशें जो तजल्लियों से चमक उठा वो नज़र का आईनाज़ार है
नहीं दिल में इश्क़ का शायबा तो हैं लाखों सजदे भी रायगाँ तुझे अपने सजदों पे ज़ुअम है मुझे आशिक़ी का ख़ुमार है
मेरे शौक़ को, मेरे ज़ौक़ को हुई जब से नाज़ाँ तलब तेरी मुझे जुस्तजू तेरे दर की है, मेरी जुस्तजू में बहार है

جہاں سجدہ ریز ہے زندگی جہاں کائنات نثار ہے
جہاں ہر طرف ہیں تجلیاں مرے مصطفےٰ کا دیار ہے

کہاں آ گئی مری بندگی ہے یہ کیسا عالمِ بےخودی
نہ تو ہوش ہے، نہ وجود ہے، یہ بلندیوں کا خمار ہے

تری اک نگاہِ کرم اٹھی تو مری حیات سنور گئی
ترا التفات نہ ہو اگر تو قدم قدم مری ہار ہے

درِ مصطفےٰ سے گذر گئی تو نسیمِ صبح مہک اٹھی
چلی چ…

कभी तो इन्केशाफ़ हो, सराब है, कि तूर है

कभी तो इन्केशाफ़ हो, सराब है, कि तूर है फ़ज़ा ए दिल में आज कल बसा हुआ जो नूर है
ये मसलेहत की साज़िशें, नसीब की इनायतें हयात की नवाज़िशें, जो पास है, वो दूर है
दलील है कि आरज़ू का बाग़ है हरा अभी जो दिल के संगलाख़ से गुलाब का ज़हूर है
मिली है रौशनी, तो फिर बढ़ेगी ताब ए दीद भी अभी से दीद का कहाँ निगाह को शऊर है
जो आरज़ू है जुर्म तो हमें भी ऐतराफ़ है ख़ता है तो ख़ता सही, जो है, तो फिर हुज़ूर, है
लिए चली ये बेख़ुदी हमें तो आसमान पर निगाह ओ दिल हैं पुरफुसूं, ये इश्क़ का सुरूर है
छुपाए लाख राज़ तू, सिले हों तेरे लब मगर तेरी निगाह कह गई, कि कुछ न कुछ ज़रूर है

कौन-ओ-मकाँ के असरारों से क्या लेना

कौन-ओ-मकाँकेअसरारोंसेक्यालेना भूकेशिकमकोअबरारोंसेक्यालेना
जिसकाहरगिर्दाबकियाकरताहैतवाफ़ झूमतीकश्तीकोधारोंसेक्यालेना
भूककीडायनराजमहलतकक्यूँजाए राहबरोंको