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Showing posts from February 7, 2019

हर किसी अपने से नालाँ, सारे बेगानों से दूर

हर किसी अपने से नालाँ, सारे बेगानों से दूर मस्लेहत तन्हा खड़ी है सारे अरमानों से दूर ہر کسی اپنے سے نالاں، سارے بیگانوں سے دور مصلحت تنہا کھڑی ہے سارے ارمانوں سے دور
मुफ़लिसी गिरिया सरा है सारे इमकानों से दूर सर पटकती है तमन्ना ऊँची दूकानों से दूर مفلسی گریہ سرا ہے سارے امکانوں سے دور سر پٹکتی ہے تمنا اونچی دوکانوں سے دور
बात कोई हो, फ़साने कितने बुन लेते हैं लोग चाहे जितनी हो हक़ीक़त ऐसे अफ़सानों से दूर بات کوئی ہو، فسانے کتنے بُن لیتے ہیں لوگ چاہے جتنی ہو حقیقت ایسے افسانوں سے دور
मर नहीं सकती हक़ीक़त बातिलों के वार से आतिश-ए-नमरूद तो है हक़ के दामानों से दूर مر نہیں سکتی حقیقت باطلوں کے وار سے آتشِ نمرود تو ہے حق کے دامانوں سے دور
सर झुकाएँ, पाँव चूमें? यूँ कोई ऐज़ाज़ लें? हम किसी कम ज़र्फ़ के रहते हैं अहसानों से दूर سر جھکائیں؟ پاؤں چومیں؟ یوں کوئی عیزاز لیں؟ ہم کسی کمظرف کے رہتے ہیں احسانوں سے دور
क्या पता मारें वो मक्खी और गला ही काट दें ख़ैर चाहो तो हमेशा रहना नादानों से दूर کیا پتہ ماریں وہ مکھی اور گلا ہی کاٹ دیں خیر چاہو تو ہمیشہ رہنا نادانوں سے دور
ओढ़ लीजे ख़ुश दिली अब वहशतों को छोड़ कर आज तो “मुमताज़” …

चंद मुर्दा ख़्वाहिशों पर आज तक टाला मुझे

चंद मुर्दा ख़्वाहिशों पर आज तक टाला मुझे क्यूँ बनाया मुझ को आख़िर, क्यूँ मिटा डाला मुझे چند مردہ خواہشوں پر آج تک ٹالا مجھے کیوں بنایا مجھ کو آخر، کیوں مٹا ڈالا مجھے
मरहबा तख़लीक़ तेरी, आफ़रीं रब्बानियत रंज से मुझ को बनाया, अश्क पर पाला मुझे مرہبہ تخلیق تیری، آفریں ربانیت رنج سے مجھ کو بنایا، اشک سے پالا مجھے
धंसती जाती है ज़मीं, और रहना है क़ायम मक़ाम आज़माइश के ये कैसे ग़ार में डाला मुझे دھنستی جاتی ہے زمیں اور رہنا ہے قائم مقام آزمائش کے یہ کیسے غار میں ڈالا مجھے
गुम कहाँ सब हो गईं रंगीनियाँ इस ज़ात की क्यूँ हर इक मंज़र नज़र आए सदा काला मुझे گُم کہاں سب ہو گئیں رنگینیاں اس ذات کی کیوں ہر اک منظر نظر آئے سدا کالا مجھے
ज़हर कुछ ऐसा घुला बहते लहू की धार में ख़ुद भी ज़ख़्मी हो गया है मारने वाला मुझे زہر کچھ ایسا گھُلا بہتے لہو کی دھار میں خود بھی زخمی ہو گیا ہے مارنے والا مجھے
तल्खियों पर डाल कर शीरीं कलामी की रिदा कह के अमृत दे गया है ज़हर का प्याला मुझे