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Showing posts from February, 2019

अस्बियत का ग़ुबार छट जाए

अस्बियत का ग़ुबार छट जाए तीरगी खुद में ही सिमट जाए عصبیت کا غبارچھٹ جائے تیرگی خود میں ہی سمٹ جائے
वो शजर दिल का फिर फले कैसे अपनी ही ज़ात से जो कट जाए وہ شجر دل کا پھر پھلے کیسے اپنی ہی ذات سے جو کٹ جائے
जब ज़ुबां अर्ज़ ए हाल की सोचे दिल ग़ुबार ए अना से अट जाए جب زباں عرضِ حال کی سوچے دل غبارِ انا سے اٹ جائے
कह दो कोई ये दश्त ए वहशत से अब मेरे रास्ते से हट जाए کہہ دو کوئی یہ دشتِ وحشت سے اب مرے راستے سے ہٹ جائے
हौसला ज़र्ब दे जो लहरा कर पत्थरों का जिगर भी फट जाए حوصلہ ضرب دے جو لہرا کر پتھروں کا جگر بھی پھٹ جائے
रात की ज़ुल्फ़ जब परेशाँ हो मुझ से हर तीरगी लिपट जाए رات کی زلف جب پریشاں ہو مجھ سے ہر تیرگی لپٹ جائے

नज़्म - बाज़ार

यहाँ हर चीज़ बिकती है कहो क्या क्या ख़रीदोगे یہاں ہر چیز بکتی ہے کہو کیا کیا خریدوگے
यहाँ पर मंसब-ओ-मेराज की बिकती हैं ज़ंजीरें अना को काट देती हैं ग़ुरूर-ओ-ज़र की शमशीरें यहाँ बिकता है तख़्त-ओ-ताज बिकता है मुक़द्दर भी ये वो बाज़ार है बिक जाते हैं इस में सिकंदर भी यहाँ बिकती है ख़ामोशी भी,लफ़्फ़ाज़ी भी बिकती है ज़मीर-ए-बेनवा की हाँ अना साज़ी भी बिकती है یہاں پر منصب و معراج کی بکتی ہیں زنجیریں انا کو کاٹ دیتی ہیں غرور و زر کی شمشیری یہاں بکتا ہے تخت و تاج بکتا ہے مقدر بھی یہ وہ بازار ہے، بک جاتے ہیں اس میں سکندر بھی یہاں بکتی ہے خاموشی بھی، لفاظی بھی بکتی ہے ضمیرِ بے نوا کی ہاں انا سازی بھی بکتی ہے
दुकानें हैं सजी देखो यहाँ पर हिर्स-ओ-हसरत की हर इक शै मिलती है हर क़िस्म की, हर एक क़ीमत की यहाँ ऐज़ाज़ बिकता है, यहाँ हर राज़ बिकता है यहाँ पर हुस्न बिकता है,

शर ख़ेज़ हैं ज़माने के हालात किस क़दर

शर ख़ेज़ हैं ज़माने के हालात किस क़दर दिल में उतर गए हैं ख़राबात किस क़दर شر خیز ہیں زمانے کے حالات کس قدر دل میں اتر گئے ہیں خرابات کس قدر
नफ़रत के कितने ख़ानों में बिखरा है आदमी क़ालिब को बाँट देते हैं तबक़ात किस क़दर نفرت کے کتنے خانوں میں بکھرا ہے آدمی قالب کو بانٹ دیتے ہیں طبقات کس قدر
हद है कि चंद सिक्कों में बिकने लगा ज़मीर इंसाँ को तोड़ देती हैं हाजात किस क़दर حد ہے کہ چند سکوں میں بکنے لگا ضمیر انساں کو توڑ دیتی ہیں حاجات کس قدر
शैतान अपनी चालों में कितना है कामयाब कम हो गए हैं दुनिया से हसनात किस क़दर شیطان اپنی چالوں میں کتنا ہے کامیاب کم ہو گئے ہیں دنیا سے حسنات کس قدر
बनने लगा है अब तो हर इक राई का पहाड़ चुभने लगी दिलों को हर इक बात किस क़दर بننے لگا ہے اب تو ہر اک رائی کا پہاڑ چبھنے لگی دلوں کو ہر اک بات کس قدر
तकते हैं हम फ़लक को सहर की उम्मीद में यारो तवील होने लगी रात किस क़दर تکتے ہیں ہم فلک کو سحر کی امید میں یارو طویل ہونے لگی رات کس قدر
शम्स-ओ-मह-ओ-नजूम सभी हो गए क़लील “मुमताज़” हम पे तारी हैं ज़ुल्मात किस क़दर شمس و مہہ و نجوم سبھی ہو گئے قلیل ممتازؔ ہم پہ طاری ہیں ظلمات کس قدر शर ख़ेज़ – झगड़े फैलाने …

हर किसी अपने से नालाँ, सारे बेगानों से दूर

हर किसी अपने से नालाँ, सारे बेगानों से दूर मस्लेहत तन्हा खड़ी है सारे अरमानों से दूर ہر کسی اپنے سے نالاں، سارے بیگانوں سے دور مصلحت تنہا کھڑی ہے سارے ارمانوں سے دور
मुफ़लिसी गिरिया सरा है सारे इमकानों से दूर सर पटकती है तमन्ना ऊँची दूकानों से दूर مفلسی گریہ سرا ہے سارے امکانوں سے دور سر پٹکتی ہے تمنا اونچی دوکانوں سے دور
बात कोई हो, फ़साने कितने बुन लेते हैं लोग चाहे जितनी हो हक़ीक़त ऐसे अफ़सानों से दूर بات کوئی ہو، فسانے کتنے بُن لیتے ہیں لوگ چاہے جتنی ہو حقیقت ایسے افسانوں سے دور
मर नहीं सकती हक़ीक़त बातिलों के वार से आतिश-ए-नमरूद तो है हक़ के दामानों से दूर مر نہیں سکتی حقیقت باطلوں کے وار سے آتشِ نمرود تو ہے حق کے دامانوں سے دور
सर झुकाएँ, पाँव चूमें? यूँ कोई ऐज़ाज़ लें? हम किसी कम ज़र्फ़ के रहते हैं अहसानों से दूर سر جھکائیں؟ پاؤں چومیں؟ یوں کوئی عیزاز لیں؟ ہم کسی کمظرف کے رہتے ہیں احسانوں سے دور
क्या पता मारें वो मक्खी और गला ही काट दें ख़ैर चाहो तो हमेशा रहना नादानों से दूर کیا پتہ ماریں وہ مکھی اور گلا ہی کاٹ دیں خیر چاہو تو ہمیشہ رہنا نادانوں سے دور
ओढ़ लीजे ख़ुश दिली अब वहशतों को छोड़ कर आज तो “मुमताज़” …

चंद मुर्दा ख़्वाहिशों पर आज तक टाला मुझे

चंद मुर्दा ख़्वाहिशों पर आज तक टाला मुझे क्यूँ बनाया मुझ को आख़िर, क्यूँ मिटा डाला मुझे چند مردہ خواہشوں پر آج تک ٹالا مجھے کیوں بنایا مجھ کو آخر، کیوں مٹا ڈالا مجھے
मरहबा तख़लीक़ तेरी, आफ़रीं रब्बानियत रंज से मुझ को बनाया, अश्क पर पाला मुझे مرہبہ تخلیق تیری، آفریں ربانیت رنج سے مجھ کو بنایا، اشک سے پالا مجھے
धंसती जाती है ज़मीं, और रहना है क़ायम मक़ाम आज़माइश के ये कैसे ग़ार में डाला मुझे دھنستی جاتی ہے زمیں اور رہنا ہے قائم مقام آزمائش کے یہ کیسے غار میں ڈالا مجھے
गुम कहाँ सब हो गईं रंगीनियाँ इस ज़ात की क्यूँ हर इक मंज़र नज़र आए सदा काला मुझे گُم کہاں سب ہو گئیں رنگینیاں اس ذات کی کیوں ہر اک منظر نظر آئے سدا کالا مجھے
ज़हर कुछ ऐसा घुला बहते लहू की धार में ख़ुद भी ज़ख़्मी हो गया है मारने वाला मुझे زہر کچھ ایسا گھُلا بہتے لہو کی دھار میں خود بھی زخمی ہو گیا ہے مارنے والا مجھے
तल्खियों पर डाल कर शीरीं कलामी की रिदा कह के अमृत दे गया है ज़हर का प्याला मुझे

ख़मोशी का जहाँ है क़ुव्वत-ए-गोयाई से आगे

ख़मोशी का जहाँ है क़ुव्वत-ए-गोयाई से आगे ख़यालों की वो दुनिया है मेरी तन्हाई से आगे
बलंदी दम बख़ुद है देख कर परवाज़ ख़्वाबों की तसव्वर ले चला मुझ को हद-ए-बीनाई से आगे
चलो यूँ ही सही, मशहूर हो जाए हमारी ज़िद कोई इनआम भी होगा इसी रुसवाई से आगे
अगर है हौसला तो फिर उतर कर देख लेते हैं न जाने क्या छुपा हो इस अतल गहराई से आगे
ये अक़्ल ओ फ़हम की दुनिया बहुत महदूद है यारो जुनूँ की दास्ताँ तो है हद-ए -दानाई से आगे
यहाँ अब ख़त्म होता है सफ़र तन्हा उड़ानों का मेरी परवाज़ पहुंची है हर इक ऊँचाई से आगे
चलेंगी साथ कब तक रौनकें इस बज़्म की आख़िर है तन्हाई छुपी इस अंजुमन आराई से आगे
मुझे महसूस हो जब भी कि मेरी हद यहाँ तक है मुझे "मुमताज़" ले जाए मेरी गहराई से आगे
khamoshi ka jahaN hai quwwat e goyaai se aage khayaaloN ki wo duniya hai meri tanhaai se aage
balandi dam ba khud hai dekh kar parwaaz khwaaboN ki