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Showing posts from March, 2019

मरासिम कोई जो बाहम न होंगे

मरासिम कोई जो बाहम न होंगे कोई खद्शात, कोई ग़म न होंगे
गुमाँ की बस्तियाँ मिस्मार कर दो यकीं के सिलसिले मुबहम न होंगे
ख़ुदा के सामने हैं सर-ब -सजदा हमारे सर कहीं भी ख़म न होंगे
निकल आए हैं हम हर कशमकश से ये सदमे अब हमें जानम न होंगे
हमारी क़द्र भी समझेगी दुनिया मगर तब, जब जहाँ में हम न होंगे
मुक़द्दर हम ने ख़ुद अपना लिखा है सितारे हम से क्यूँ बरहम न होंगे
मुझे तू जैसे चाहे आज़मा ले "मेरे जज़्बात-ए-उल्फ़त कम न होंगे"
यहाँ "मुमताज़" ठहरी हैं खिज़ाएँ यहाँ अब ख़्वाब के मौसम न होंगे
marasim koi jo baaham na honge koi khadshaat, koi gham na honge
gumaaN ki bastiyaaN mismaar kar do

तश्नगी निगाहों की लम्हा भर को मिट जाए

तश्नगी निगाहों की लम्हा भर को मिट जाए सामने कभी तो वो नूर बे नक़ाब आए تشنگی نگاہوں کی لمحہ بھر کو مٹ جائے سامنے کبھی تو وہ نور بےنقاب آئے
छीन लें सभी मंज़र आँख से तो मुमकिन है क़ैद से निगाहों की दिल निजात भी पाए چھین لیں سبھی منظر آنکھ سے تو ممکن ہے قید سے نگاہوں کی دل نجات بھی پائے
जल के ख़ाक हो जाए रूह-ओ-क़ल्ब की दुनिया आरज़ू के सहरा में कौन आग दहकाए جل کے خاک ہو جائے روح و قلب کی دنیا آرزو کے سحرا میں کون آگ دہکائے
आज तक बग़ावत पर दिल रहा है आमादा मस्लेहत मेरे दिल को जाने कब से समझाए آج تک بغاوت پر دل رہا ہے آمادہ مصلحت مرے دل کو جانے کب سے سمجھائے
वादी-ए-अना का हर ज़ाविया मोअत्तर है दिल के इस घरौंदे को किस की याद महकाए وادیء انا کا ہر زاویہ معطر ہے دل کے اس گھروندے کو کس کی یاد مہکائے
याद के दरीचों से बच के हम चले लेकिन दिल पे अब भी पड़ते हैं गुज़रे वक़्त के साए یاد کے دریچوں سے بچ کے ہم چلے لیکن دل پہ اب بھی پڑتے ہیں گذرے وقت کے سائے
सींचते हैं अश्कों से यूँ भी दिल को हम अक्सर शायद इस बयाबाँ में फिर बहार लौट आए سینچتے ہیں اشکوں سے یوں بھی دل کو ہم اکثر شائد اس بیاباں میں پھر بہار لوٹ آئے
हम फ़रेब दें इन क…

ज़हन ओ दिल इरफ़ान से सरशार होना चाहिए

ज़हन ओ दिल इरफ़ान से सरशार होना चाहिए अब इबादत का जुदा मेयार होना चाहिए
नाम है मुस्लिम, मगर इस्लाम का ऐ दोस्तो अब ज़ुबान-ए-दिल से भी इक़रार होना चाहिए
देख डाला है नज़र ने हर नज़ारा, अब मगर गुंबद-ए-ख़ज़रा का बस दीदार होना चाहिए
अहमद-ए-मुरसल की ज़ात-ए-पाक का जब ज़िक्र हो रूह आसिम, बावज़ू किरदार होना चाहिए
होगा फिर "मुमताज़" दिल पर इंकेशाफ़-ए-राज़-ए-हक़ ज़हन-ओ-दिल में वो हेरा का गार होना चाहिए