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Showing posts from January 13, 2019

समझता है मेरी हर इक नज़र, हर ज़ाविया मेरा

समझता है मेरी हर इक नज़र, हर ज़ाविया मेरा न जाने कौन है वो अजनबी, वो रहनुमा मेरा
सिमट आता है हुस्न-ए-दोजहाँ मेरे सरापा में जो बन जाती हैं उस की दो निगाहें आईना मेरा
मुकफ़्फ़ल कर दिया था हर निशाँ दिल में, मगर फिर भी ज़माने पर अयाँ हो ही गया है अलमिया मेरा
रखा था दुखती रग पर हाथ अनजाने में यादों ने ज़रा से लम्स ने फिर फोड़ डाला आबला मेरा
शिकायत मैं करूँ भी तो अब इस से फ़ायदा क्या है हँसी में वो उड़ाता है, हमेशा, हर गिला मेरा
जूनून-ए-सरफ़रोशीकी सनाख्वानी भी होनी है अभी तो ज़िन्दगानी पढ़ रही है मर्सिया मेरा
मिटाता है, मिटा कर फिर कई आकार देता है मुक़द्दर रफ़्ता रफ़्ता ले रहा है जायज़ा मेरा
ज़रा ठहरो, समेटूँ तो, मैं अपने मुन्तशिर टुकड़े