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Showing posts from June 15, 2018

पछता रहे हैं काम से उस को निकाल के

पछता रहे हैं काम से उस को निकाल के खाएँगे कितने दिन यूँ ही अंडे उबाल के
तिरसठ बरस की सिन में तमन्ना है हूर की जुम्मन मियाँ को शौक़ हुए हैं कमाल के
पतली गली से जल्द खिसक लो तो ख़ैर है रक्खा है क़र्ज़ख़्वाहों को वादों प टाल के
मुश्टंडे चार हम ने बुला रक्खे हैं कि अब जूते बना के पहनेंगे आशिक़ की खाल के
ख़ाविंद खट रहा है शब-ओ-रोज़ काम में बेगम मज़े उड़ाती है शौहर के माल के
फिर भी न बदनज़र से बचा हुस्न कार का लटकन कई लगाए थे घोड़े की नाल के
“मुमताज़” राह-ए-इश्क़ की मजबूरियाँ न पूछ परखच्चे उड़ गए हैं मियाँ बाल बाल के

एक क़तआ

मेरी ज़िद मुझ को मेरा ज़ख़्म-ए-दिल सीने नहीं देती अना की आज़माइश अश्क भी पीने नहीं देती अजब आलम है, दिल का रेज़ा रेज़ा डूबा जाता है ये उलझन और ये बेचैनी मुझे जीने नहीं देती

ऐसे मरकज़ प है ख़ूँख़्वारी अब इन्सानों की

ऐसे मरकज़ प है ख़ूँख़्वारी अब इन्सानों की अब भला क्या है ज़रूरत यहाँ शैतानों की
बेड़ियाँ चीख़ उठीं यूँ कि जुनूँ जाग उठा हिल गईं आज तो दीवारें भी ज़िंदानों की
उन निगाहों की शरारत का ख़ुदा हाफ़िज़ है लूट लें झुक के ज़रा आबरू मैख़ानों की
हम ने घबरा के जो आबाद किया है इन को आज रौनक़ है सिवा देख लो वीरानों की
ख़ून से लिक्खी गई है ये मोहब्बत की किताब कितनी दिलचस्प इबारत है इन अफ़सानों की
अपनी क़िस्मत का भरम रखने को हम तो “मुमताज़” लाश काँधों पे लिए फिरते हैं अरमानों की