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Showing posts from June 9, 2018

है एक सा सब का लहू, फिर क्या है ये तेरा मेरा

है एक सा सब का लहू, फिर क्या है ये तेरा मेरा हिन्दू तेरे, मुस्लिम तेरे, काशी तेरी, काबा तेरा
बैठे हुए हैं आज तक, तू ने जहाँ छोड़ा हमें हम पर है ये इल्ज़ाम क्यूँ रास्ता नहीं देखा तेरा
जीने का फ़न, मरने की ख़ू, सौ हसरतें टूटी हुईं क्या क्या हमें तू ने दिया, एहसान है क्या क्या तेरा
फिर इम्तेहाँ का वक़्त है, साइल है तू दर पर मेरे उलफ़त की रख लूँ लाज फिर, ला तोड़ दूँ कासा तेरा
ये रब्त भी अक्सर रहा तेरे मेरे जज़्बात में आँखें नहीं सूखीं मेरी, दामन नहीं भीगा तेरा
जलती हुई बाद-ए-सबा, भीगी हुईं परछाइयाँ ऐ सुबह-ए-ग़म कुछ तो बता, क्यूँ रंग है काला तेरा
तन्हा रहे “मुमताज़” कब हम ज़िन्दगी की राह में अब तक मेरे हमराह है तेरी महक, साया तेरा

गिरिया करे, तड़प के वफ़ा की दुहाई दे

गिरिया करे, तड़प के वफ़ा की दुहाई दे फ़रियाद फिर भी दिल की न उसको सुनाई दे
अपना तो कुछ भी मुझ को न मेरा अताई दे दिल फूँकने को आग भी दे तो पराई दे
अब के ठहर गई है मेरी ज़िन्दगी में रात इन ज़ुलमतों म में राह भी कैसे सुझाई दे
यूँ बेख़ुदी में मिट गया एहसास-ए-दर्द भी मेरा जुनून ज़ख़्म भी मुझ को हिनाई दे
मैं ने कुचल दिया है हर इक आरज़ू का फन अब मुझ को दिल की चीख़ में नग़्मा सुनाई दे
वहशत सी अब तो होने लगी है हयात से मेरी घुटन को भी तो कभी लब कुशाई दे
टकरा के लौट आती हैं हर बार अर्श से मेरी दुआओं को भी कभी तो रसाई दे
चीख़ों से शेर ढालेगी “मुमताज़” कब तलक अब तो सुख़न की क़ैद से ख़ुद को रिहाई दे