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Showing posts from December 2, 2018

दिल पे चलता ही नहीं अब कोई बस

दिल पे चलता ही नहीं अब कोई बस आरज़ू होती नहीं हैटससेमस
दौर-ए-हाज़िर का ये सरमाया है बस खुदसरी, मतलब परस्ती और हवस
ये गुज़र जाता है ठोकर मार कर कब किसी का वक़्त पर चलता है बस
आशियाँ की आंच पहुंची है यहाँ तीलियाँ तपती हैं, जलता है क़फ़स
डूबजाएनाउम्मीदीकाजहाँ आज ऐ बारान-ए-रहमत यूँ बरस
सूखता जाता है दिल का आबशार ज़िन्दगी में अब कहाँ बाक़ी वो रस
मैं करूँ फ़रियाद? नामुमकिन, तो क्यूँ "कोई खाए मेरी हालत पर तरस"
है यक़ीं ख़ुद पर तो फिर "मुमताज़" जी क्यूँ भला दिल में है इतना पेश-ओ-पस