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Showing posts from December 31, 2018

अजनबी एहसास

है रात गुलाबी, सर्द हवा बेदार1 हुआ है एक फुसूँ2 बेचैन पलों के नरग़े3 में मैं तनहा तनहा बैठी हूँ है ज़हन परेशाँ, बेकल दिल क्या जाने ये कैसी उलझन है खोई हूँ न जाने किस धुन में बस, जागते में भी सोई हूँ वीरान फ़ज़ा-ए-ज़हन में फिर आहट ये किसी की आती है रह रह के मुझे चौंकाती है रह रह के मुझे तडपाती है रह रह के तरब4 के कानों में आती है न जाने किस की सदा अब आग लगी अब सर्द हुई वो आस जली वो दर्द बुझा
कुछ यादें हैं कुछ साए हैं

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, मेरी जान-ए-ग़ज़ल

मेरे महबूब, मेरे दोस्त, मेरी जान-ए-ग़ज़ल दो क़दम राह-ए-मोहब्बत में मेरे साथ भी चल
दो घड़ी बैठ मेरे पास, कि मैं पढ़ लूँ ज़रा तेरी पेशानी प लिक्खा है मेरी ज़ीस्त का हल
एक उम्मीद प उलझे हैं हर इक पेच से हम हौसला खोल ही देगा कभी तक़दीर के बल
वक़्त की गर्द छुपा देती है हर एक निशाँ संग पर खींची लकीरें रहें कितनी भी अटल
टूटे ख़्वाबों की ख़लिश1 जान भी ले लेती है ख़्वाब दिखला के मुझे ऐ दिल-ए-बेताब न छल
जी नहीं पाता है इंसान कभी बरसों में ज़िन्दगी करने को काफ़ी है कभी एक ही पल
नूर और नार2 का मैं रोज़ तमाशा देखूं ख़ूँचकाँ3 शम्स4 को तारीक5 फ़िज़ा जाए निगल
मार डाले न कहीं तुझ को ये तन्हाई का ज़हर दिल के वीरान अंधेरों से कभी यार निकल
नौहाख़्वाँ6 क्यूँ हुए "मुमताज़" सभी मुर्दा ख़याल मदफ़न7-ए-दिल में अजब कैसा ये हंगाम था कल