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ग़ज़ल - जब यार पुराने मिलते हैं

माज़ी के निशाँ और हाल का ग़म जब एक ठिकाने मिलते हैं कुछ और चुभन बढ़ जाती है जब यार पुराने मिलते हैं
MAAZI KE NISHAA'N AUR HAAL KA GHAM JAB EK THIKAANE MILTE HAI'N KUCHH AUR CHUBHAN BADH JAATI HAI, JAB YAAR PURAANE MILTE HAI'N
कुछ दर्द के तूफ़ाँ उठते हैं, कुछ आग ख़ुशी की जलती है इक हश्र बपा हो जाता है जब दोनों ज़माने मिलते हैं KUCHH DARD KE TOOFAA'N UTHTE HAI'N KUCHH AAG KHUSHI KI JALTI HAI IK HASHR BAPAA HO JAATA HAI, JAB DONO'N ZAMAANE MILTE HAI'N
उस लज़्ज़त से महरूम हुए गो एक ज़माना बीत गया अब भी वो हमें महरूमी का एहसास दिलाने मिलते हैं US LAZZAT SE MEHROOM HUE GO EK ZAMAANA BEET GAYA AB BHI WO HAME'N MEHROOMI KA EHSAAS DILAANE MILTE HAI'N
घर छोड़ के जाना पड़ता है, दिन रात मिलाने पड़ते हैं पुरज़ोर मशक़्क़त से यारो कुछ रिज़्क़ के दाने मिलते हैं GHAR CHHOD KE JAANA PADTA HAI, DIN RAAT MILAANE PADTE HAI'N PURZOR MASHAQQAT SE YAARO, KUCHH RIZQ KE DAANE MILTE HAI'N
अब तक तो फ़ज़ा-ए-ज़हन में भी वीरान ख़िज़ाँ का मौसम है देखें तो बहारों में अबके क्या ख़्वाब न जाने मिलते हैं AB T…