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Showing posts from November 12, 2018

ख़्वाब के मंज़र को मंज़िल का निशाँ समझी थी मैं

ख़्वाब के मंज़र को मंज़िल का निशाँ समझी थी मैं मजमा-ए-याराँ को अब तक कारवाँ समझी थी मैं
खोखली थी, दीमकों ने चाट डाला था उसे शाख़ वो, जिस को कि अपना आशियाँ समझी थी मैं
एक ही हिचकी में सब कर्ब-ओ-अज़ीयत मिट गई ज़िन्दगी की तल्ख़ियों को जाविदाँ समझी थी मैं
मसलेहत की आँच से पल में पिघल कर रह गया वो जुनूँ जिस को अभी तक बेतकाँ समझी थी मैं
जुस्तजू जब की तो पै दर पै सभी खुलते गए ज़ाविए अपनी भी हस्ती के कहाँ समझी थी मैं
इस तलातुम ने बुलंदी बख़्श दी इस ज़ात को इन्क़ेलाब-ए-ज़हन-ओ-दिल को तो ज़ियाँ समझी थी मैं
बन गया “मुमताज़” दुश्मन मेरी जाँ का आजकल दिल वही, जिस को कि अपना राज़दाँ समझी थी मैं

मजमा-ए-याराँ – दोस्तों का जमावड़ा, कर्ब-ओ-अज़ीयत – दर्द और तकलीफ़, जाविदाँ - अमर, मसलेहत – दुनियादारी, बेतकाँ – न थकने वाला, जुस्तजू - तलाश, पै दर पै – stepbystep, ज़ाविए - पहलू, तलातुम - तूफ़ान, इन्क़ेलाब - क्रांति, ज़हन - मस्तिष्क, ज़ियाँ – नुक़सान

khwaab ke manzar ko manzil ka nishaaN samjhi thi maiN
majma-e-yaaraaN ko ab tak kaarwaaN samjhi thi maiN

khokhli thi, deemkoN ne chaat daala tha use
shaakh wo jis ko ki apna aashiyaaN s…

परिंदे अपने ख़्वाबों के तो मुस्तक़बिल में रहते हैं

परिंदे अपने ख़्वाबों के तो मुस्तक़बिल में रहते हैं क़दम राहों पे लेकिन वलवले मंज़िल में रहते हैं
मुक़द्दर खेल कितने खेलता है हम से, देखो तो हमीं हल करते हैं मुश्किल हमीं मुश्किल में रहते हैं
निगाहों की हरारत से भी जल जाता है हर पर्दा छुपेंगे किस तरह वह जो नज़र के तिल में रहते हैं
गुनह ख़ुद अपने होने की गवाही देने लगता है लहू के दाग़ तो अक्सर कफ़-ए-क़ातिल में रहते हैं
अगर हम ही न हों तो ज़ीस्त किस को आज़माएगी हमारे हौसले भी तो यहाँ हासिल में रहते हैं
इन्हें भी क़त्ल करने का अमल सोचेंगे फिर कोई अगर अरमान कुछ बाक़ी दिल-ए-बिस्मिल में रहते हैं
अमूमन जान दे कर भी किनारा पा ही लेती है शिकस्ता नाव के टुकड़े दबे साहिल में होते हैं
तलब इंसाफ़ की बिलकुल बजा है, सोच लो लेकिन यहाँ “मुमताज़” क़ातिल भी छुपे आदिल में रहते हैं
parinde apni khwaaboN ke to mustaqbil meN rahte haiN  qadam raahoN pe lekin walwale manzil meN rahte haiN 
muqaddar khel kitne khelta hai ham se, dekho to
hameeN hal karte haiN mushkil, hameeN mushkil meN rahte haiN
nigaahoN kee haraarat se bhi jal jaata hai har parda  chhupenge kis tarah wo jo nazar …